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कौन करता है सरकारी भूमि पर कब्जा

rashtratimesnewspaper January 30, 2026 1 min read
kaun

विवेक शुक्ला

देश के हरेक छोटे बड़े शहरों से लेकर महानगरों में सरकारी और सार्वजनिक जमीन पर कब्जा जमाने का सिलसिला तेज होता जा रहा है। जब कब्जा करने वालों को खदेड़ा जाता है, तब बवाल मच जाता है। दिल्ली ही नहीं, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में भी सार्वजनिक भूमि, फुटपाथ, पार्क और सड़कों पर अतिक्रमण आम हो गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इन शहरों में हजारों एकड़ भूमि अवैध कब्जों से प्रभावित है, जिससे ट्रैफिक जाम, बाढ़ जैसी आपदाएं, पर्यावरण क्षरण और जीवन स्तर में गिरावट आ रही है। उदाहरण के लिए, मुंबई में रेलवे भूमि पर 10,000 से अधिक अतिक्रमण के मामले दर्ज हुए हैं, जबकि अन्य शहरों में फुटपाथ और सड़क किनारे पर दुकानें-ठेले सार्वजनिक स्थान को निगल रहे हैं। यह समस्या न केवल शहरी भीड़ बढ़ाती है, बल्कि बुनियादी ढांचे पर दबाव डालती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।

इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण जरूरी है। सबसे पहले, नियमित सर्वेक्षण और सख्त निगरानी प्रणाली होनी चाहिए। रेलवे और नगर निगमों को स्थानीय प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय करना होगा। अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास की ठोस योजना बनानी होगी, ताकि कार्रवाई मानवीय हो। साथ ही, भूमि उपयोग नीतियों में सुधार, किफायती आवास योजनाओं का विस्तार और कानूनी प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है।

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अमित बंसल ने बीती 23 जनवरी 2026 को अपने एक अहम फैसले में दिल्ली नगर निगम को निर्देश दिया कि वह पूर्वी दिल्ली की मंडावली रोड पर अवैध ठेला वालों और अतिक्रमणों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। बेशक, यह निर्देश एक मिसाल कायम कर सकता है और अन्य सड़कों तथा सरकारी सार्वजनिक भूमियों को अनधिकृत कब्जेदारों और भूमि माफिया से मुक्त कराने के लिए समान कार्रवाई को प्रोत्साहित कर सकता है।यह मामला स्थानीय निवासी जय चौधरी द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ, जिनकी ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष सोनी ने
पैरवी की। चौधरी की शिकायत में मुख्य रूप से सब्जी विक्रेताओं द्वारा सड़क के बड़े
हिस्से पर कब्जा करने से होने वाली गंभीर असुविधाओं को उजागर किया गया था। याचिका के अनुसार, “लगभग 15 मीटर चौड़ी सड़क का करीब आधा हिस्सा आम
लोगों के आवागमन (वाहन चलाने या पैदल चलने) के लिए खत्म हो गया है, और दिन में वाहनों की लोडिंग/अनलोडिंग से समस्या और बढ़ जाती है।”

यह स्थिति दिल्ली में एक बड़ी बीमारी का रूप ले चुकी है, जहां सार्वजनिक मार्ग पर नियमित रूप से कब्जे हो जाते हैं, जिससे ट्रैफिक जाम, सुरक्षा खतरे और निवासियों की जीवन गुणवत्ता में कमी आती है। इससे पहले, कोर्ट ने कई एजेंसियों को तलब किया था, जिनमें दिल्ली नगर निगम, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की स्पेशल टास्क फोर्स, और दिल्ली ट्रैफिक पुलिस शामिल थे। इनसे प्रभावित क्षेत्र की स्टेटस रिपोर्ट मांगी गई थी। लेकिन याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि ” कोर्ट के फैसले का केवल डीडीए ने अनुपालन किया, जबकि अन्य ने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की।” जस्टिस बंसल का नवीनतम आदेश अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ एक अहम फैसला है।

“महानगरों में सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण की समस्या तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में सड़कों, फुटपाथों, पार्कों और विशेष रूप से रेलवे की भूमि पर अवैध कब्जे आम हो गए हैं। यह समस्या न केवल शहरी विकास को बाधित कर रही है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा, यातायात और बुनियादी ढांचे के विस्तार में भी बड़ी रुकावट बन रही है, यह बात दिल्ली हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट सचिन पुरी कहते हैं।

पिछले दिनों राजधानी के तुर्कमान गेट इलाके में कोर्ट ते आदेश के बाद अतिक्रमण हटाने के लिए आए सरकारी मुलाजिमों और पुलिस से
स्थानीय लोगों ने बहुत झगड़ा किया था। पुलिस ने बहुत से शरारती तत्वों को गिरफ्तार भी किया था।

इस बीच. भारतीय रेलवे के पास देशभर में लगभग 4.99 लाख हेक्टेयर भूमि है, जिसमें से 1,068 हेक्टेयर से अधिक पर अतिक्रमण है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में राज्यसभा में यह जानकारी दी थी। महानगरों में यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि यहां जनसंख्या का दबाव अधिक है और भूमि की कीमत बहुत ऊंची है। मुंबई में रेलवे ट्रैक के किनारे झुग्गी-झोपड़ियां, दिल्ली में कई इलाकों में फुटपाथ और सड़क किनारे अतिक्रमण, कोलकाता और चेन्नई में भी इसी तरह के मामले सामने आते रहते हैं। हाल के वर्षों में गुवाहाटी, मोहाली, बांद्रा (मुंबई) जैसे स्थानों पर रेलवे ने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए, जहां सैकड़ों संरचनाएं ध्वस्त की गईं।

सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण भी उतना ही चिंताजनक है। फुटपाथों पर दुकानें, ठेले, धार्मिक संरचनाएं या निजी वाहनों का
पार्किंग होना आम बात हो गई है। दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में भी फुटपाथ सिकुड़ते जा रहे हैं, जबकि गरीब इलाकों में अतिक्रमण हटाने के अभियान तेज हैं। इससे यातायात जाम, दुर्घटनाओं का खतरा और पैदल चलने वालों के लिए असुविधा बढ़ती है। इस समस्या के प्रमुख कारणों में तेज शहरीकरण, बेरोजगरी, गरीबी और भूमि की कमी शामिल हैं। प्रवासी मजदूर और निम्न आय वर्ग के लोग सस्ती जगह की तलाश में सरकारी भूमि पर कब्जा कर लेते हैं।

सरकारी संपत्ति जनता की संपत्ति है। इसे बचाना और उसका उचित उपयोग सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है। यदि महानगरों में अतिक्रमण पर प्रभावी रोक नहीं लगी, तो शहरी विकास और सार्वजनिक सुविधाओं का सपना अधूरा रह जाएगा। समय आ गया है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें।

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