दिल्ली पैरालंपिक समिति की अध्यक्ष पारुल सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि किया संबोधन
मनोज शर्मा
राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दिल्ली वाईडब्ल्यूसीए द्वारा कॉन्स्टेंटिया हॉल, नई दिल्ली में “अधिकार, प्रतिरोध और सुधार” विषय पर एक गरिमामय और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम भारत कोकिला, स्वतंत्रता सेनानी और महान कवयित्री सरोजिनी नायडू की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया।
पीएएसआई के सहयोग से हुए इस आयोजन में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकार, उनके संघर्ष और सामाजिक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर गंभीर चर्चा की गई। विशेष रूप से दिव्यांग महिलाओं सहित सभी महिलाओं के लिए समान अवसर और समावेशी नीतियों की जरूरत पर बल दिया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली पैरालंपिक समिति (दिल्ली की दिव्यांग पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन) की अध्यक्ष श्रीमती पारुल सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वास्तविक सशक्तिकरण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस और समावेशी नीतियों के माध्यम से संभव है।
उन्होंने कहा, “सच्चा सशक्तिकरण तब शुरू होता है जब हम केवल बातों से आगे बढ़कर बाधाओं को तोड़ते हैं और असमानता के खिलाफ मजबूती से खड़े होते हैं। सरोजिनी नायडू की विरासत हमें प्रेरित करती है कि हम ऐसे सुधारों के लिए प्रतिबद्ध रहें जो हर महिला को आगे बढ़ाएं और अधिकार व न्याय की राह में किसी को पीछे न छोड़ें।”कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा रही, जिसमें डॉ. दिव्या तंवर, सुश्री निर्मला और एडवोकेट सुश्री नेहा सलूजा ने सहभागिता की। चर्चा के दौरान लिंग समानता से जुड़े मुद्दों, सामाजिक एवं कानूनी चुनौतियों और प्रभावी सुधारों के रास्तों पर गहन विचार-विमर्श किया गया।
महिलाओं के स्वास्थ्य एवं शिक्षा की समर्थक डॉ. दिव्या तंवर ने कहा, “अधिकार किसी को दिए नहीं जाते, उन्हें सामूहिक संघर्ष से हासिल किया जाता है। राष्ट्रीय महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि हाशिए पर खड़ी महिलाओं की आवाज को मजबूत करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।”समाजसेवी सुश्री निर्मला ने अपने विचार रखते हुए कहा,“संघर्ष ही सुधार की शुरुआत है। सरोजिनी नायडू के काव्यात्मक विद्रोह से लेकर आज के जमीनी आंदोलनों तक, महिलाओं ने हर दौर में नेतृत्व किया है। हमें इसी भावना के साथ ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहां हर महिला सुरक्षित और सम्मानित हो।”
लिंग न्याय की विशेषज्ञ एडवोकेट नेहा सलूजा ने कहा,“कानूनी सुधार स्थायी बदलाव की नींव रखते हैं, लेकिन उनकी सफलता समाज की सोच में परिवर्तन पर निर्भर करती है। महिलाओं के अधिकार ही मानवाधिकार हैं, जिन्हें संघर्ष और दृढ़ता से सुरक्षित रखना होगा।”कार्यक्रम में महिलाओं के इतिहास और समकालीन मुद्दों पर आधारित एक रोचक क्विज प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। इसके अतिरिक्त एक प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सशक्तिकरण, संघर्ष और सफलता की कहानियों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। इन गतिविधियों ने न केवल जागरूकता बढ़ाई, बल्कि उपस्थित जनों को सामाजिक परिवर्तन की दिशा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित भी किया। राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम महिलाओं के अधिकार, समावेशिता और सामाजिक न्याय के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता का सशक्त संदेश देकर संपन्न हुआ।