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कैमरे वालियों के संघर्ष की कहानी

rashtratimesnewspaper March 27, 2026 1 min read
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अमरेंद्र कुमार राय

भारतीय फिल्म जगत में फिल्म “ शोले ” का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। इस फिल्म में मशहूर ऐक्ट्रेस और सांसद हेमा मालिनी ने तांगा चलाकर तांगेवालियों को मशहूर कर दिया था। जिन लोगों ने ये फिल्म देखी है उन्हें वो गाना आज भी याद है…. बड़ी नखरेवालियां, होती हैं तांगे वालियां…। इसी तरह से फोटो जर्नलिस्ट सर्वेश ने महिला फोटोग्रॉफरों पर पुस्तक लिखकर उन्हें मशहूर बना दिया है। उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम भी ” कैमरे वालियां ” रखा है। इसमें 35 महिला फोटोग्रॉफरों के संघर्ष की कहानी है।
होमई व्योरवाला को देश की पहली महिला फोटोग्राफर माना जाता है। पुस्तक की शुरुआत उन्हीं के संघर्ष से की गई है। उनका जन्म 1913 में गुजरात के नवसारी जिले में हुआ था। आजादी से पहले और आजादी के बाद वे एकमात्र महिला फोटोग्राफर थीं। लेकिन उन्हें अपनी पहचान बनाने में लंबा वक्त लगा। हेनरी कार्टियर-ब्रेजर और मार्गरेट ब्रोक ह्वाइट उनकी समकालीन फोटोग्राफर थीं और उनकी ख्याति अंतरराष्ट्रीय थी। भारत भी उस समय अंग्रेजों का गुलाम था। ऐसे में होमई व्योरवाला के काम को पहचान मिलना बहुत कठिन था। लेकिन जब मैनहट्टन रूबी म्यूजियम ऑफ ऑर्ट ने उन्हें ” कैंडिट विद लेंस एंड लाइट ऑफ होमई व्योरवाला ” उपाधि से सम्मानित किया तो इनकी भी अच्छे फोटोग्राफरों में गिनती की जाने लगी।
होमई ने फोटोग्रॉफी का प्रशिक्षण मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ ऑर्ट्स से लिया था। अपनी फोटोग्रॉफी के शुरुआती दिनों में उन्होंने मुंबई के ग्रामीण और शहरी जीवन को दर्शाया। उन्होंने महिलाओं के जीवन को भी अपने कैमरे में कैद किया। उनकी तस्वीरें उस समय मशहूर पत्रिकाओं ” इलेस्ट्रेटेड वीकली ” और ” बाम्बे क्रॉनिकल ” में भी प्रकाशित होती थीं। लेकिन उनमें इनका नाम मानेकशाह जाता था। इसलिए उन फोटो का श्रेय उन्हें नहीं मिल पाता था।
1942 में व्योरवाला दिल्ली आ गईं और ब्रिटिश सेवा सूचना में नौकरी करने लगीं। वहीं उन्होंने भारतीय परंपराओं की एक डाकूमेंट्री बनाई। उसी दौरान उनकी मुलाकात मार्टिन लूथर किंग, मोहम्मद रजा शाह पहलवी और रूसी नेता ब्रेजनेव और ख्रुश्चेव जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्वों से हुई। अब व्योरवाला को एक अच्छे फोटोग्रॉफर के रूप में जाना जाने लगा था। 1956 में व्योरवाला ने उस समय की जानी-मानी पत्रिका टाइम लाइफ के लिए युवा दलाई लामा की फोटो ली। इसके बाद ” करंट ” और ” ऑन लुकर ” पत्रिका ने उनसे खूबसूरत महिलाओं की फोटो लाने को कहा। तब उन्होंने दूसरी खूबसूरत महिलाओं के साथ ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ और अमेरिका की पहली महिला फैशन डिजाइनर जैकलिन कैनेडी की फोटो भी खींची। 1948 में महात्मा गांधी के अंतिम संस्कार के दौरान खींची गई उनकी तस्वीरें काफी चर्चित रहीं।
दूसरी फोटोग्रॉफर हैं सरस्वती चक्रवर्ती। इनका जन्म तो बेंगलुरू में हुआ था लेकिन शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में। ये मध्यम वर्गीय परिवार की थीं। पिता सरकारी कर्मचारी थे और अपनी सीमित आय में अपने चार बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। परिवार की मदद करने के लिए सरस्वती ने पढ़ाई पूरी करने के बाद शॉर्टहैंड और टाइपिंग सीखी और एक प्राइवेट कंपनी में काम शुरू कर दिया। उनकी शादी एक प्रेस फोटोग्रॉफर से हुई। उन्होंने अपने घर में ही फोटो डेवलप करने के लिए डार्क रूम बना रखा था। सरस्वती फोटो डेवलप करने में उनकी मदद करती थीं। इस तरह उन्होंने फोटोग्रॉफी के बहुत सारे गुर सीख लिये। एक बार उन्हें 26 जनवरी की परेड देखने का अवसर मिला। उन्होंने देखा कि जितने फोटो खींचने वाले हैं सब पुरुष हैं। उनके मन में खयाल आया कि काश इनके बीच कोई महिला फोटोग्रॉफर होती तो कितना अच्छा लगता। और सरस्वती ने फोटोग्रॉफर बनने की ठान ली। शुरू में उन्होंने कॉमर्शियल फोटोग्रॉफी की। शादी-विवाह, डांस शो आदि के फोटो खींचती थीं लेकिन जल्दी ही वे पत्र-पत्रिकाओं के लिए फ्री लांसिंग करने लगीं। कुछ समय तक उन्होंने पीटीआई के लिए भी काम किया। उस समय कैमरा मैन भी कम ही होते थे। ऐसे में महिला कैमरामैन होने के नाते इन्हें अलग से पहचान और सम्मान मिलता था। अब सरस्वती फोटोग्रॉफी नहीं करतीं लेकिन अपने समय में उन्होंने उस समय की तमाम घटनाओं को कवर किया। जिसमें एन टी रामाराव, एशियाड 82, देवराला का रूप कुंवर सती कांड, उत्तरकाशी का भूकंप और कश्मीर की आतंकवादी घटनाएं शामिल हैं। 1987 में वे राजीव गंधी के साथ श्रीलंका गईं और तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत के साथ सियाचीन भी जाने का अवसर मिला। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी-मुशर्रफ की चर्चित आगरा सम्मिट को भी कवर किया।
कोलकाता की फोटो जर्नलिस्ट कृष्णा राय के हिस्से सिर्फ संघर्ष ही है। बचपन से लेकर आजतक। वे पिछले 26 साल से फोटोग्रॉफी कर रही हैं। पिछले 16 साल से तो टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए। लेकिन अभी तक वहां स्टाफर नहीं बन पाईं। छह भाई बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। पढ़ने में अच्छी थीं मगर दादी ने जल्दी शादी करवा दी। दो बच्चे भी हो गये। पति इंजीनियर थे लेकिन जल्दी ही बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। अब घर की सारी जिम्मेदारी कृष्णा पर ही आ पड़ी। खुद कमाकर घर तो चलाना ही था पति के इलाज पर अच्छा खासा पैसा खर्च हो रहा था। ऐसे में फोटोग्रॉफी इनके बड़े काम आई।
पहले इन्होंने शौकिया तौर पर एक फोटो खींचा। एक महिला पीठ पर अपने बच्चे को लादे पहाड़ चढ़ रही थी। कुछ दिन बाद वो बच्चा खो गया। तब वो महिला इनके पास वही फोटो मांगने आई ताकि उसे पुलिस को दिया जा सके। क्योंकि बच्चे की और कोई फोटो नहीं थी। तब कृष्णा को लगा कि फोटोग्रॉफी बड़ी कमाल और काम की चीज है। बस फिर क्या था। उठा लिया कैमरा। पहले कृष्णा छोटी जगह पर थीं। लेकिन जब पति का तबादला कोलकाता हो गया तो इनके सपनों को चार चांद लग गये। बाद में वो सपना इनके जीवन का संघर्ष ही बन गया।
उमा कदम को पिता की मृत्यु फोटोग्रॉफी के पेशे में ले आई। शुरू में इनका शौक फोटोग्रॉफी नहीं था। ये अकाउंटेंट थीं। लेकिन इनके पिता की अचानक मृत्यु

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