क्रिप्टो एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (CASPs) लंबे समय से वर्चुअल डिजिटल एसेट इकोसिस्टम की रीढ़ रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म ऐसे मार्केटप्लेस के रूप में काम करते हैं जहां उपयोगकर्ता क्रिप्टो एसेट्स की खरीद, बिक्री और ट्रेडिंग करते हैं। लेकिन बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के एक हालिया पेपर के अनुसार, दुनिया के बड़े CASPs अब इस भूमिका से काफी आगे बढ़ चुके हैं। आज ये प्लेटफॉर्म पारंपरिक वित्तीय संस्थानों—जैसे बैंक और क्रेडिट संस्थान—की तरह काम करने लगे हैं। BIS इन्हें मल्टीफंक्शन क्रिप्टोएसेट इंटरमीडियरी (MCIs) कहता है और मानता है कि इनकी कार्यप्रणाली को समझना इनके नियमन के लिए बेहद जरूरी है।
उदाहरण के तौर पर, अधिकांश MCIs अपने उपयोगकर्ताओं को “अर्न प्रोग्राम्स” की सुविधा देते हैं। इन प्रोग्राम्स में ग्राहक अपनी निष्क्रिय क्रिप्टो संपत्ति को प्लेटफॉर्म पर जमा करते हैं और बदले में उन्हें रिटर्न मिलता है। ग्राहक एक निश्चित अवधि के लिए अपने टोकन का स्वामित्व MCI को ट्रांसफर करते हैं। इसके बदले MCI यह वादा करता है कि वह तय समय के बाद मूल एसेट के साथ अतिरिक्त रिटर्न देगा। इसके बाद MCI इन एसेट्स को आगे उधार देता है और उससे होने वाली कमाई का एक हिस्सा ग्राहक को लौटाता है। निवेश का प्रदर्शन कैसा भी हो, अनुबंध के अनुसार ग्राहक को उनका एसेट या उसके बराबर मूल्य वापस मिलना तय होता है।
दरअसल, MCIs वही कर रहे हैं जो बैंक करते हैं—ग्राहकों के फंड को लेकर उसे आगे निवेश में लगाना। लेकिन बैंकों के मामले में यह सब सख्त नियमों और दिशानिर्देशों के तहत होता है, जिससे उपभोक्ताओं और उनकी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। वहीं MCIs के लिए फिलहाल ऐसे स्पष्ट नियामक सुरक्षा तंत्र अनिवार्य नहीं हैं।
यह पेपर MCIs को गलत या अवैध गतिविधियों में लिप्त नहीं बताता। इसमें कहा गया है कि यह स्थिति उनके बिजनेस मॉडल का परिणाम है, न कि किसी गलत मंशा का। लेकिन यह भी साफ है कि मौजूदा नियामक ढांचा इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला पाया है। 2025 तक, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) द्वारा सर्वे किए गए देशों में से केवल 11 के पास क्रिप्टो गतिविधियों से जुड़े जोखिमों पर अंतिम नियामक ढांचा था। इनमें से भी केवल दो देशों में MCI के उधार और ऋण से जुड़े कार्यों को कवर किया गया था।
BIS का सुझाव है कि MCIs के लिए एंटिटी-बेस्ड और एक्टिविटी-बेस्ड दोनों तरह का नियमन जरूरी है। एंटिटी-बेस्ड नियमन का मतलब है कि पूरे MCI प्लेटफॉर्म को एक संस्था के रूप में निगरानी में रखा जाए, जैसे बैंकों को नियंत्रित किया जाता है। इसमें उनके बिजनेस मॉडल और जोखिम के आधार पर नियम तय किए जाएंगे। वहीं एक्टिविटी-बेस्ड नियमन के तहत लीवरेज लिमिट, ग्राहक संपत्ति की सुरक्षा और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू किए जाएंगे। इसके अलावा मजबूत गवर्नेंस, स्ट्रेस टेस्टिंग और समेकित निगरानी भी जरूरी मानी गई है।
जैसे-जैसे MCIs पारंपरिक वित्तीय प्रणाली से जुड़ते जा रहे हैं—जैसे एक्सचेंज ट्रेडेड प्रोडक्ट्स, कस्टडी सेवाएं और संस्थागत साझेदारी—वैसे-वैसे इनके विफल होने का जोखिम व्यापक वित्तीय प्रणाली पर असर डाल सकता है। यह पेपर यह नहीं कहता कि MCIs का अस्तित्व समस्या है, बल्कि यह बताता है कि इतने बड़े स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं को नियामक दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।