- चेतन शर्मा
राजधानी के प्रतिष्ठित संविधान क्लब ऑफ इंडिया में “गुड गवर्नेंस : पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी” विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें न्यायपालिका, प्रशासन, विधि जगत, सामाजिक संगठनों तथा आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों ने भाग लेकर सुशासन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने शासन व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिक सहभागिता और संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया।
संगोष्ठी के मुख्य आकर्षण दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति जस्टिस मेहता रहे, जिन्होंने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल कानूनों के निर्माण से नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, प्रशासन और नागरिक समाज के बीच बेहतर समन्वय ही सुशासन की आधारशिला है। उन्होंने न्याय तक आम नागरिक की सहज पहुंच को लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।
कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने संविधान की मूल भावना, विधि के शासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा में संस्थाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सुशासन का अर्थ केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है जिसमें नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और सहभागी महसूस करें। उन्होंने न्यायिक सुधारों, त्वरित न्याय प्रणाली तथा कानूनी जागरूकता को मजबूत बनाने पर बल दिया।
दिल्ली के उपमहापौर ने राजधानी में नागरिक सुविधाओं, स्वच्छता, जल प्रबंधन और स्थानीय निकायों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि स्थानीय प्रशासन और नागरिक संगठनों के बीच बेहतर संवाद स्थापित कर ही शहर को अधिक उत्तरदायी और जनहितकारी बनाया जा सकता है।
पूर्व संयुक्त निदेशक, सीबीआई एवं दिल्ली के उपराज्यपाल के पूर्व ओएसडी शांतनु सेन ने प्रशासनिक पारदर्शिता, भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र और जवाबदेही के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि तकनीक आधारित प्रशासन, डिजिटल निगरानी और जन शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत किए बिना सुशासन की अवधारणा अधूरी रहेगी। उन्होंने सरकारी संस्थाओं में नैतिक मूल्यों और सेवा भावना को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
संगोष्ठी में राजधानी के प्रमुख आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सक्रिय भागीदारी की। बी.एस. वोहरा, राजीव काकरिया सहित विभिन्न आरडब्ल्यूए पदाधिकारियों ने दिल्ली में नागरिक समस्याओं, शहरी अव्यवस्था, प्रदूषण, पार्किंग, सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया। वक्ताओं ने कहा कि नागरिक संगठनों को केवल शिकायतकर्ता नहीं बल्कि शासन व्यवस्था के साझेदार के रूप में देखा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ नागरिक जागरूकता और सहभागिता भी अत्यंत आवश्यक है। विशेषज्ञों ने शिक्षा, कानून, तकनीक और सामाजिक उत्तरदायित्व को सुशासन के चार प्रमुख स्तंभ बताते हुए सरकार और समाज के बीच विश्वास बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
संगोष्ठी में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि सुशासन की अवधारणा को केवल सरकारी नीतियों तक सीमित न रखकर जनआंदोलन का स्वरूप दिया जाए, ताकि लोकतंत्र की जड़ें और अधिक मजबूत हो सकें।