- जितेन्द्र रघुवंशी
हरिद्वार। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. राजेन्द्र बहादुर सिंह की 20वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्री महाकालेश्वर महादेव मंदिर, प्रज्ञाकुंज, जगजीतपुर में श्रद्धा एवं प्रेरणा से ओतप्रोत श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भारत भूषण विद्यालंकार, स्थानीय विधायक आदेश चौहान, आचार्य करुणेश मिश्रा, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि तथा अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। इस अवसर पर विधायक आदेश चौहान ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का इतिहास और उनके त्याग, तपस्या एवं बलिदान की गाथा को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे महान व्यक्तित्वों का जीवन समाज को राष्ट्रभक्ति और सेवा का संदेश देता है।

संगठन के अध्यक्ष देशबन्धु ने स्व. राजेन्द्र बहादुर सिंह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे महात्मा गांधी की असीम अनुकम्पा के पात्र रहे। गांधीजी के हस्तलिखित पत्र उनकी निकटता और विश्वास का प्रमाण हैं। स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति (रजि.) के राष्ट्रीय महासचिव एवं स्व. राजेन्द्र बहादुर सिंह के पुत्र जितेन्द्र रघुवंशी ने अपने पिता के जीवन संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान का विस्तृत उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि स्व. राजेन्द्र बहादुर सिंह का जन्म 11 अगस्त 1911 को चित्रकूट के पावन अंचल ग्राम पिंडरा (जागीरदार) में स्व. दुर्गा प्रसाद सिंह एवं श्रीमती सुखदेव देवी के घर हुआ। विंध्याचल और कामदगिरि की बीहड़ पहाड़ियां अंग्रेजों के दमन से बचने के लिए क्रांतिकारियों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल थीं। वर्ष 1930 में उनके नेतृत्व में ‘महावीर दल’ का गठन हुआ, जो गांधीजी की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहा। दिसंबर 1930 में वे एक प्रतिनिधिमंडल के साथ सत्याग्रह हेतु आगरा, दिल्ली और अजमेर गए।

स्व. सिंह ने राज्य या पद की अपेक्षा स्वतंत्रता को अपना सर्वोच्च लक्ष्य माना और वर्धा आश्रम चले गए, जहां 1936 से 1938 तक महादेव भाई जैसे वरिष्ठ सेनानियों के सान्निध्य में सेवा कार्य किया। 14 जनवरी 1938 को पयस्वनी नदी के त्रिवेणी घाट पर आयोजित कांग्रेस अधिवेशन की व्यवस्था की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। नवंबर 1938 में चित्रकूट में प्रजा परिषद का गठन हुआ। 1945 में उनके नेतृत्व में प्रजा मंडल की स्थापना हुई, जिसने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और गिरफ्तारियां दीं।
पारिवारिक दबाव के बावजूद वे स्वतंत्रता संग्राम को प्राथमिकता देते रहे। विवाह न करने के अपने संकल्प की जानकारी भी उन्होंने गांधीजी को पत्र द्वारा दी। गांधीजी ने उत्तर में लिखा कि विवाह कोई अपराध नहीं, बल्कि जीवनसाथी का सहयोग संघर्ष को और गति दे सकता है। अंततः 1943 में सत्यवती देवी के साथ उनका विवाह हुआ, जो स्वयं भी स्वतंत्रता की अलख जगा रही थीं।

स्व. राजेन्द्र बहादुर सिंह ने 2006 में महाशिवरात्रि के दूसरे दिन प्रज्ञाकुंज, जगजीतपुर स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। कनखल श्मशान घाट में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
श्रद्धांजलि सभा के उपरांत प्रतिवर्ष की भांति महाशिवरात्रि के अवसर पर भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। कार्यक्रम में प्रभाश मिश्रा, कैलाश चंद वैष्णव, वीरेंद्र गहलोत, डॉ. वेद प्रकाश आर्य, जोगिंद्र सिंह तनेजा, सुरेंद्र छाबड़ा, विवेक कुमार शर्मा, वी.एन. चौधरी, राम बाबू कुशवाहा, नरेंद्र कुमार वर्मा, अनुराग सिंह गौतम, आदित्य गहलोत, प्रमेश चौधरी, चंद्र प्रकाश मगन, अनुज गुप्ता, बृजेश सिंह, सतपाल सिंह, सत्यवीर सिंह, पुनीत श्रीवास्तव, दीपक कुमार, अवतार सिंह, सतेन्द कुमार, स्वाती गुप्ता, श्रीमती शीला सिंह, कमला देवी, आशा रघुवंशी, गीता देवी गुप्ता, निशा सिंह कुशवाहा, पूनम शैलेन्द्र सिंह, पूनम बृजेश सिंह सहित अनेक लोगों ने सहयोग प्रदान किया।