हनुमानजी ने लक्ष्मणजी को आखिर क्यों सुग्रीव के पलंग पर बिठा दिया था ?

0
7
46 Views


विगत अंकों में हमने इस विषय पर चिंतन किया था कि श्री हनुमान जी ने सुग्रीव को चार विधियों का ज्ञान प्रदान किया था जिससे सुग्रीव का समस्त अज्ञान हरा गया था। इससे सुग्रीव की भीतरी अवस्था भले अवश्य ही परिवर्तित हुई थी, लेकिन किष्किंधा वासियों की भयक्रांत मनोदशा तो श्री लक्ष्मण जी के कोप से जस की तस थी। किष्किंधा वासी तो छोड़िए, स्वयं सुग्रीव भी तो भय से पीला पड़ा हुआ था। और श्री हनुमान जी थे कि सुग्रीव को आगे का समाधान स्वयं ढूंढ़ने हेतु प्रेरित कर रहे थे। इसी उहापोह में सुग्रीव एक सुंदर रास्ता निकाल लेता है। सुग्रीव अपनी पत्नी तारा को, श्री हनुमान जी के साथ, श्री लक्ष्मण जी के सान्निधय में उपस्थित होने हेतु भेज देते हैं-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: जब लक्ष्मणजी धनुष-बाण लेकर पहुँच गये तो सुग्रीव को हनुमानजी का ही सहारा था

‘तारा सहित जाइ हनुमाना।’

चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।’

श्री हनुमान जी केवल तारा को ही संग लेकर नहीं जाते, अपितु श्री लक्ष्मण जी से अन्य कोई चर्चा न करके सिर्फ और सिर्फ प्रभु श्री राम जी की महिमा का ही गुणगान करते हैं। तारा को साथ लेकर जाना व श्रीलक्ष्मण जी को प्रभु श्रीराम जी की लीला सुनाना, यह दो पहलू अपने-आप में सफल व सुखद मानव जीवन के ऐसे सूत्र हैं कि उन्हें अनदेखा और अनसुना करना महान गलती होगा। इन विषयों पर हम निश्चित ही एक गहन चिंतन करेंगे। सुग्रीव का तारा को श्रीलक्ष्मण जी के सान्निध्य में भेजना दर्शाता है कि कई बार विषयों से सुरक्षा पाने हेतु हठधर्म का प्रयोग भी करना पड़ता है। हठधर्म यह कि वैसे तो अध्यात्म में ज्ञान मार्ग ही एक ऐसा साधन है, जिससे साधक अपने भटके व विषयी मन को जीत पाता है। लेकिन संस्कारों के कारण अगर कोई जीव स्वयं को ऐसा करने में असमर्थ पाता है, तो विषयों के समक्ष समपर्ण करने की अपेक्षा द्विसूत्रीय मार्ग का चयन ही श्रेयस्कर होता है। पहला सूत्र यह कि या तो उस स्थान से स्वयं को हटा लीजिए, जहाँ पर विषयों को पोषित करने वाला साधन है। अथवा विषय के साधन को ही स्वयं को दूर कर दो। सुग्रीव ने इनमें से दूसरे सूत्र का चयन किया। वह अपनी पत्नी को ही श्री लक्ष्मण जी के समक्ष ले जाकर प्रस्तुत कर देता है। और दृढ़ता से अपना पक्ष रखना चाह रहा है, कि हे काल के अवतार श्रीरामानुज! मैं अपना सर्वस्व आपके चरणों में अर्पित कर रहा हुँ। सर्वस्व इसलिए कि एक विषयी व्यक्ति के जीवन का केन्द्र बिन्दु ही वह पात्र होता है, जहाँ से उसके विषयों की पूर्ति होती है। और अपने विषय के केन्द्र बिन्दु को कोई वैराग्य के श्रीचरणों में अर्पित कर दे, तो मानो उसने अपना सर्वस्व भेंट चढ़ा दिया है। और यह कठिन कार्य जब महान विषयों का दास, सुग्रीव जैसा व्यक्ति करता है, तो और भी प्रशंसनीय हो जाता है। विचारणीय व मंथन योग्य विषय है कि क्या वैराग्य की शरण में जाकर तारा अब भी विषय भोग का साधन रह गई थी। जी नहीं। क्योंकि श्रीलक्ष्मण जी तो स्वयं प्रभु के ही प्रतिबिंब हैं। उन्हीं का ही दूसरा रूप हैं। अतः उनके चरणों में समर्पित होना, साक्षात प्रभु के श्रीचरणों में अर्पित होना ही है। और प्रभु के चरणों में अर्पित होने के पश्चात् तो विषय क्या, विष भी अमृत बन जाता है, अर्थात प्रभु के प्रसाद के रूप में परिवर्तित हो जाता है। और तारा अब विषय का स्रोत न होकर, ज्ञानमति देवी का स्वरूप धारण कर चुकी थी। जिसका संग करके बुद्धि का स्वरूप कुबुद्धि में परिवर्तित नहीं होता, अपितु सुबुद्धि का आकार धारण करती है। और सुग्रीव ने यह सद्कार्य कर डाला था। लेकिन श्रीलक्ष्मण जी का क्रोध इतने भर से शाँत हो जायेगा, यह पूर्णतः आवश्यक नहीं था। तो साथ में श्री हनुमान जी अपना ‘मास्टर स्ट्रोक’ प्ले करते हैं। मास्टर स्ट्रोक यह कि तारा को श्री लक्ष्मण जी के समक्ष प्रस्तुत करने के साथ-साथ श्रीहनुमान जी प्रभु की पावन गाथा व गुणगान करने लगते हैं-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: लक्ष्मणजी का क्रोध देखकर सुग्रीव ने अपनी पत्नी को याचना के लिए क्यों भेजा ?

‘चरन बंदि प्रभु युजस बखाना’। 

श्रीलक्ष्मण जी के कर्ण द्वार जैसे ही श्रीराम जी के सुंदर गान का रसपान करते हैं, तो वे भूल ही जाते हैं, कि वे किसी को मारने अथवा डराने भी आए हैं। उनका क्रोध तत्काल ही छू मंत्र हो जाता है। नेत्रों में छाई उग्रता व लाली अचानक ही स्नेह व ममता में परिवर्तित हो जाती है। जो श्रीलक्ष्मण जी केवल सुग्रीव को ढूंढ़ने के इलावा कोई बात ही नहीं कर रहे थे, वे श्रीलक्ष्मण जी एक शब्द अपने श्रीमुख से नहीं कहते। जैसे एक सपेरा फ़नीअर को बीन बजाकर वश में कर लेता है, ठीक वैसे ही श्रीहनुमान जी ने श्रीलक्ष्मण जी को मानो बाँध-सा लिया था। मजाल है कि श्रीलक्ष्मण जी टस से मस भी कर जाते। श्रीहनुमान जी ने देखा कि बीन अब हमारी ही धुन बजा रही है, तो क्यों न अपनी रागनी भी छेड़ दी जाए। श्रीहनुमान जी श्रीरामानुज जी से विनती करते हैं, कि हे नाथ! इतनी तो कृपा आप कीजिए ही, कि भीतर आकर पलंग पर विराजमान हो जाइये। श्रीलक्ष्मण जी भला बैठने थोड़ी न आये थे, अपितु सुग्रीव के उठे फ़न को बिठाने आए थे। लेकिन प्रभु के यशगान के पाश में वे ऐसे बँधे कि मानो पूर्णतः परतंत्र से हो गए हैं। और उन्हें स्वयं भी भान न रहा कि कब वे श्रीहनुमान जी के कहने पर पलंग पर विराजमान हो गए। यहाँ एक बात और बड़ी विचित्र-सी घटी कि वह पलंग भी किसी और का नहीं था, अपितु सुग्रीव का ही पलंग था। जिस पलंग पर सुग्रीव ने अनकों रस भोग भोगे थे। तात्विक दृष्टि से देखें तो श्रीलक्ष्मण जी के बैठने के लिए यह आसन पूर्णतः अनुपयुक्त था। लेकिन आध्यात्मिक चिंतन के महाधनी श्रीहनुमान जी से यह चूक भला कैसे हो गई, कि श्रीलक्ष्मण जी के लिए यह आसन उपयुक्त नहीं है। फिर एक बात और सोचने की है, कि घर में आये किसी सम्मानीय अतिथि को जब बैठाने की बात आती है, उनके लिए सुंदर सिंघासन अथवा सोफा या कुर्सी का प्रबंध किया जाता है। उन्हें पलंग पर नहीं बिठाया जाता। कारण कि पलंग बैठने का नहीं, अपितु शयन करने का साधन है। श्रीलक्ष्मण जी ने अगर पलंग पर सोना होता, तो श्रीहनुमान जी की यह क्रिया समझ में भी आती। लेकिन इस क्रिया को अब क्या समझा जाये। श्रीहनुमान जी की लीला के पीछे अवश्य ही कोई विशेष कारण होगा। क्या था वह कारण, और क्या उस कारण से सुग्रीव के बचाव पक्ष में कोई लाभ हुआ? अथवा नहीं। जानेंगे अगले अंक में…(क्रमशः)…जय श्रीराम!

-सुखी भारती



Source link

Pulkit Chaturvedi
Senior journalist with over 13 years of experience covering various fields of Journalism.

Keen interests in politics, sports, music and bollywood.

Leave a Reply