नई दिल्ली। फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के तत्वावधान में दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में संत कबीर साहेब के 628वें प्रकटोत्सव के अवसर पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत संत कबीर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई। संगोष्ठी का विषय था— “संत कबीर साहेब आज क्यों प्रासंगिक हैं?”
कार्यक्रम की अध्यक्षता फोरम के चेयरमैन प्रो. हंसराज सुमन ने की। मुख्य वक्ताओं में प्रो. के.पी. सिंह, डॉ. वी.के. कटारिया, डॉ. योगेश, डॉ. राज पाल सिंह, श्री घनश्याम भारती, सुश्री पल्लवी प्रियदर्शनी एवं श्री प्रसून पाटिल शामिल रहे। मंच संचालन शोधार्थी अविनाश ने किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. हंसराज सुमन ने कहा कि वर्तमान समय में सामाजिक समरसता, सद्भाव और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए कबीर साहेब के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि कबीर ने जाति व्यवस्था, ऊँच-नीच, धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास और शोषण जैसी अमानवीय प्रवृत्तियों का खुलकर विरोध किया तथा समतामूलक समाज की स्थापना का संदेश दिया।
मुख्य वक्ता प्रो. के.पी. सिंह ने कहा कि कबीर साहेब महान दार्शनिक, समाज सुधारक और स्वतंत्र चिंतक थे। उन्होंने धर्म, जाति और सामाजिक भेदभाव से मुक्त समाज की कल्पना की। कबीर ने कर्म, सादगी और आचरण की शुद्धता को जीवन का आधार माना तथा अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़ियों का विरोध किया।
अन्य वक्ताओं ने कहा कि कबीर साहेब ने अपने विचार जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए सरल और लोकभाषा का प्रयोग किया। उनके विचार आज भी सामाजिक एकता, मानवता और सदाचार के लिए मार्गदर्शक हैं। सुश्री पल्लवी प्रियदर्शनी ने कहा कि कबीर साहेब अहंकार, भेदभाव और अलगाववाद के विरोधी थे तथा मानवीय प्रेम को सर्वोच्च मूल्य मानते थे।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. हंसराज सुमन ने कबीर साहेब के दोहों, साखियों और पदों का गायन किया। धन्यवाद ज्ञापन सुश्री पल्लवी प्रियदर्शनी ने किया।