कांग्रेस मुक्त भारत में जुटीं ममता, यूपी में विकास की जगह धर्म बना गया है राजनीति का केंद्रबिंदु

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उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। वार-पलटवार का दौर भी खूब हो रहा है, वह भी समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच। भाजपा अपने कामकाज के साथ-साथ हिंदुत्व को भी लहर देने की कोशिश में जुट गई है।

वैसे तो इस सप्ताह देश में कई सारे मुद्दे सुर्खियों में रहे। लेकिन हमने प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच चल रही तनातनी पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश और पंजाब के राजनीतिक हालातों को भी समझने की कोशिश की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच हो रही जुबानी जंग को लेकर जब हमने नीरज दुबे से सवाल किया तो उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि कहीं ना कहीं ममता बनर्जी खुद को अब राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने में जुटी हुई है। अगर उन्हें खुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना है तो कांग्रेस को दरकिनार करना होगा और शायद यही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री कर भी रही हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से कांग्रेस, यूपीए तथा राहुल गांधी पर ममता बनर्जी हमलावर हैं उससे तो ऐसा लगता है कि भाजपा के कांग्रेस मुक्त अभियान के नारे को ममता बनर्जी ही सफल बना रही हैं। नीरज दुबे ने माना कि कहीं ना कहीं कांग्रेस ममता बनर्जी कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरने से बैकफुट पर जाते दिखाई दे रही है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि फिलहाल कांग्रेस की वजह से कई क्षेत्रीय दल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है। यही कारण है कि वह कांग्रेस से गठबंधन करने की बजाय नए विकल्प को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं और शायद ममता बनर्जी इस को भली-भांति समझ रही हैं। 

प्रशांत किशोर को लेकर नीरज दुबे ने कहा कि एक समय पीके की कांग्रेस में जाने की खूब चर्चा हो रही थी और उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत पार्टी के कई दिग्गज नेताओं से मुलाकात भी की थी। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि इस मुलाकात से पीके ने कांग्रेस की कमजोरियों को जाना और अब उसी का फायदा वह ममता बनर्जी को पहुंचा रहे हैं। उन्होंने शरद पवार और ममता बनर्जी से मुलाकात को लेकर कहा कि कहीं ना कहीं राष्ट्रीय स्तर पर एक गठबंधन की कवायद को हवा देने की कोशिश की जा रही है। शरद पवार आज भी राजनीति के महारथी हैं और ऐसे में उनका साथ ममता बनर्जी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। हालांकि दुबे ने इस बात पर भी आशंका जताई कि अगर शरद पवार ममता बनर्जी के साथ खड़े रहते हैं तो फिर महाराष्ट्र की विकास आघाडी सरकार का क्या होगा जिसमें कांग्रेस भी शामिल है? नीरज दुबे ने यह भी कहा कि जब कोई पार्टी सत्ता में रहती है तभी वह गठबंधन का अस्तित्व भी रहता है। मनमोहन सरकार के 2014 में जाने के बाद से यूपीए कमजोर हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि कांग्रेस कमजोर हुई है। उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस के नेताओं को यह बताना चाहिए कि आखिर यूपीए की बैठक कब हुई थी? ऐसे में यूपीए पर ममता बनर्जी क्यों ना सवाल उठाएं। 

BJP के खिलाफ सशक्त विपक्षी मोर्चा खड़ा करने और उसका नेतृत्व हासिल करने के लिए प्रयासरत तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी अपने अभियान में कितनी सफल हो पाती हैं यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन एक बात स्पष्ट है कि अगले आम चुनावों में Congress को कई चुनौतियों का सामना करना होगा। कांग्रेस चूँकि पार्टी के तौर पर खुद ही एकजुट नहीं है इसलिए उसके सहयोगी दल उसके साथ खड़ा रहने पर खुद के लिए खतरा महसूस कर रहे हैं। इसी खतरे का स्तर शायद ममता बनर्जी विपक्षी दलों को समझा पाने में सफल हो रही हैं तभी उन्होंने कहा है कि UPA जैसा कुछ नहीं है। वैसे संप्रग के इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि कांग्रेस के उस वक्त करीब 150 सांसद थे अब 50 हैं। वाम मोर्चा के 62 सांसद थे, लेकिन अब छह हैं। 

उत्तर प्रदेश में चढ़ता राजनीतिक पारा

उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। वार-पलटवार का दौर भी खूब हो रहा है, वह भी समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच। भाजपा अपने कामकाज के साथ-साथ हिंदुत्व को भी लहर देने की कोशिश में जुट गई है। यही कारण है कि इस सप्ताह केशव प्रसाद मौर्य के एक ट्वीट ने खूब सुर्खियां बटोरी। केशव प्रसाद मौर्य ने अपने ट्वीट में साफ कह दिया अयोध्या-काशी में भव्य मंदिर का निर्माण जारी है, मथुरा की तैयारी है। कहीं ना कहीं यह मामला काफी संवेदनशील हो जाता है और हिंदुत्व के लहर को उग्र करता है। दरअसल वर्षों से चले आ रहे राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट ने सुलझा दिया। उसके बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। राम मंदिर निर्माण को लेकर किस तरीके का आंदोलन रहा यह हम सबको पता है। काशी में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का काम चल रहा है जिसका उद्घाटन भी इसी महीने कर दिया जाएगा। लेकिन मथुरा में भी एक विवाद काफी दिनों से चल रहा है। वह विवाद मंदिर और मस्जिद का है। इसी संदर्भ में केशव प्रसाद मौर्य का यह ट्वीट था। जब विवाद बढ़ा तो केशव प्रसाद मौर्य ने यह पूछ लिया कि जो लोग मुझसे सवाल कर रहे हैं वह बताएं कि क्या वह मथुरा में कृष्ण के मंदिर के पक्ष में है या नहीं है? जाहिर सी बात है केशव प्रसाद मौर्य ने चुनाव से पहले एक ऐसा विषय छेड़ा है जो भाजपा को सूट करता है। 

इसी मुद्दे पर जब हमने नीरज दुबे से सवाल किया तो उन्होंने साफ तौर पर कहा चुनाव में विकास के मुद्दे खूब उठते उठाए जाते हैं। चुनाव विकास के मुद्दे पर ही होनी चाहिए। लेकिन जीतती भी वही पार्टी है जो लोगों के सेंटीमेंट्स को जीत सके, जो लोगों की भावनाओं को जीत सके। लोगों की भावनाओं को जीतने के लिए पार्टियां इस तरह के मुद्दे उठाती रहती हैं। केशव प्रसाद मौर्य भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। राम मंदिर आंदोलन में काफी सक्रिय रहे थे। ऐसे में उनकी ओर से मथुरा मुद्दा उठाया गया है तो जाहिर सी बात है कि चुनाव से पहले वह एक बार फिर से राज्य में हिंदुत्व की लहर को हवा देना चाहते हैं। इसके साथ ही नीरज दुबे ने कहा कि हाल में योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अगली बार कार सेवा होगी तो उन पर गोलियां नहीं बल्कि फूलों की वर्षा की जाएगी। जिससे बहुत कुछ पता चल जाता है। हालांकि जो मुद्दे संवेदनशील है उस पर किसी राजनेता को संयमित होकर बात रखनी चाहिए। लेकिन चुनावी मौसम में शायद यह कम देखने को मिलता है। 

पंजाब की राजनीति

हमने पंजाब की राजनीति पर भी नीरज दुबे से बातचीत की। नीरज दुबे ने कहा कि कहीं ना कहीं पंजाब में होने वाला अगला चुनाव काफी दिलचस्प हो चुका है। अब तक रेस से बाहर कहीं जाने वाली भाजपा अब रेस में आ गई है। कृषि कानूनों के वापस होने के बाद किसान आंदोलन अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। अमरिंदर सिंह भी भाजपा के साथ गठबंधन की कवायद शुरू कर चुके हैं। सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि अकाली दल भी अब भाजपा के साथ आ सकती है। उन्होंने कहा कि इस बात की हैरानी नहीं होनी चाहिए जब पंजाब में अमरिंदर सिंह की पार्टी अकाली दल और भाजपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़े। हालांकि इसके साथ ही नीरज दुबे ने एक प्रश्न भी छोड़ दिया कि कहीं ना कहीं इस गठबंधन में एक मुद्दे पर पेंच फंसेगा और वह मुद्दा है मुख्यमंत्री की कुर्सी का। सवाल यह होगा कि आखिर इस गठबंधन का मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा। अकाली दल के सुखबीर सिंह खुद के लिए मुख्यमंत्री पद चाहेंगे तो वही अमरिंदर शायद इतनी आसानी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। दूसरी और नीरज दुबे ने पंजाब की फ्री पॉलिटिक्स पर भी तंज कसा और जिस तरीके से केजरीवाल और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है उस पर भी हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि देखना होगा कि जैसे ऐसे पंजाब चुनाव नजदीक आएंगे यह पार्टियां और भी कितनी एक हमलावर एक दूसरे पर होती हैं।

– अंकित सिंह



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Pulkit Chaturvedi
Senior journalist with over 13 years of experience covering various fields of Journalism.

Keen interests in politics, sports, music and bollywood.

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