बीजिंग ओलंपिक के बहिष्कार के जरिये यूरोपीय देशों की चीन के पर कतरने की तैयारी, भारत किस पशोपेश में फंसा?

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यूरोपीय देशों का ये बहिष्कार चीन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। वाशिंगटन द्वारा बीजिंग विंटर ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार के ऐलान के 48 घंटों के भीतर ही कनाडा ने भी बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों का राजनयिक बहिष्कार का ऐलान कर दिया।

साल 2022 यानी अगले ही साल चीन के बीजिंग में शीतकालीन ओलंपिक खेल होने हैं। ओलंपिक खेलों की शुरूआत में 100 दिन से भी कम समय बचा है और ऐसे में एक-एक कर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत कई यूरोपीय देश इसके राजनयिक बहिष्कार करने की घोषणा करते जा रहे हैं। यूरोपीय देशों का ये बहिष्कार चीन के लिए एक  बड़ा झटका माना जा रहा है।  वाशिंगटन द्वारा बीजिंग विंटर ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार के ऐलान के 48 घंटों के भीतर ही कनाडा ने भी बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों का राजनयिक बहिष्कार का ऐलान कर दिया। अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया की तरह कनाडा ने भी मानवाधिकार चिंताओं के कारण ये फैसला लिया है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि उनकी सरकार इस मामले को लेकर अपने सहयोगियों के साथ बात कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘चीन सरकार द्वारा बार-बार मानवाधिकारों के उल्लंघन से हम बेहद चिंतित हैं। उन्हें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हम कोई राजनयिक प्रतिनिधि नहीं भेज रहे हैं। वहीं लगातार कई देशों के बीजिंग ओलंपिक बहिष्कार के बाद चीन की तरफ से वही घिसा-पिटा राग अलापा गया है कि वो इस फैसले पर ठोस जवाबी कार्रवाई करेंगे। 

यूरोपीय देशों ने किया बहिष्कार 

कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया ने मानवाधिकार के उल्लंघन के मसले पर विंटर ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार का ऐलान किया है। इससे पहले यूरोपियन संसद में बीजिंग के शीतकालीन ओलंपिक के बहिष्कार का ऐलान किया था। मामले पर यूरोपीय संसद के सांसदों ने सहमति जताते हुए कहा कि हमें चीन के मानवाधिकारों के हनन के कारण बीजिंग 2022 शीतकालीन ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले निमंत्रण को अस्वीकार करना चाहिए। इसके साथ ही ईयू सांसदों ने अपनी सरकारों से मांग करते हुए उईगर मुसलमानों को लेकर चीन के व्यवहार पर और अधिक प्रतिबंध लगाने की बात भी कही।  मानवाधिकार कार्यकर्ता, एथलीट और राजनेता पहले से ही मानवाधिकार कारणों से खेलों को रद्द या इनका बहिष्कार देखना चाहते हैं। 

इससे पहले कब हुआ ओलंपिक खेलों का बहिष्कार

इससे पहले छह ओलंपिक खेलों ने बहिष्कार और कम देशों की भागीदारी झेली है। 1956 (मेलबर्न), 1964 (टोक्यो), 1976 (मॉन्ट्रियल), 1980 (मॉस्को), 1984 (लॉस एंजिल्स) और 1988 (सियोल) में युद्ध, आक्रमण और रंगभेद जैसे कारणों से विभिन्न देशों ने ओलंपिक खेलों का बहिष्कार किया।  

अमेरिका ने इससे पहले कितना बार किया ओलपिंक खेलों का बहिष्कार

1936 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक आधिकारिक तौर पर XI ओलंपियाड के खेलों के नाम से जाना जाता था। जो 1 9 36 में बर्लिन, नाजी जर्मनी में आयोजित किया गया था। 1931 में अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 1936 खेलों के मेजबान शहर के रूप में बर्लिन को चुना, जर्मनी की ओर एक स्वागत योग्य इशारा, जो प्रथम विश्व युद्ध में हारने के बाद बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। दो साल बाद, एडॉल्फ हिटलर ने जर्मन यहूदियों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न के अपने अभियान की शुरुआत करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया। जर्मनी में नाजी शासन के बाद अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक अधिकारियों ने जर्मनी के यहूदियों और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के साथ व्यवहार के बारे में चिंता व्यक्त की। मानवाधिकार कार्यकर्ताओँ ने बहिष्कार के लिए दबाव डाला और अश्वेत एथलीटों पर खेलों को छोड़ने का दबाव डाला गया। लेकिन कई लोगों ने अमेरिकी रुख में पाखंड की ओर इशारा किया। एक विदेशी देश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को अलग किया, जबकि अश्वेत अभी भी दक्षिण में जिम क्रो कानूनों और भेदभाव के अन्य रूपों के शिकार थे। अंत में एमेच्योर एथलेटिक यूनियन ने खेलों में भाग लेने के लिए मतदान का सहारा लिया। कनाडा, चेकोस्लोवाकिया, ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे अन्य राष्ट्र भी बहिष्कार पर विचार कर रहे थे। अगस्त 1936 में प्रकाशित एक न्यूयॉर्क टाइम्स की कहानी “ओलंपिक लीव ग्लो ऑफ प्राइड इन द रीच” शीर्षक के साथ बर्लिन खेलों, इसकी उपस्थिति और संगठन की सराहना की, टाइम्स ने कहा कि उन्होंने “जर्मनों को फिर से इंसान बनाया।” अमेरिका ने साल 1980 में मास्को ओलंपिक का पूरी तरह बहिष्कार किया था। 21 मार्च, 1980 को राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने घोषणा की कि 24 दिसंबर, 1979 को अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण के जवाब में संयुक्त राज्य अमेरिका मास्को में होने वाले ग्रीष्मकालीन ओलंपिक का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने शुरू में बहिष्कार का समर्थन किया लेकिन अंत में खेलों में प्रतिनिधिमंडल भेज दिया।

 भारत का क्या है स्टैंड

चीन के साथ पिछले एक साल से ज़्यादा वक़्त से सरहद पर तनाव है और दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं। दोनों देशों के सैनिकों में हिंसक झड़प भी हो चुकी है और सैनिकों की मौत भी। ऐसे में माना ये जा रहा था कि भारत भी अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों की तरह ही चीन को लेकर कुछ इसी तरह का कदम उठाकर मानवाधिकार के खिलाफ चीन को सख्त संदेश देगा। लेकिन इस सब से इतर भारत-चीन तनावपूर्ण संबंधों के बीच 2022 में बीजिंग में होने वाले शीतकालीन ओलंपिक और पैरा ओलंपिक में भारत ने समर्थन किया है। भारत की तरफ से विंटर ओलंपिक में चीन की मेजबानी का समर्थन किया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लवरोफ और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ आभाषी बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ओलंपिक और पैरालंपिक्स खेलों के आयोजन में चीन का समर्थन किया है। इसको लेकर चीन काफी गदगद हो उठा है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि जिस देश ने ओलंपिक खेलों में हिटलर के खिलाफ अपनी गर्दन नहीं झुकाई थी। वो आज क्यों इसके बहिष्कार के मद्दे पर हिचकिचा रहा है। क्या भारत को अभी भी ये उम्मीद है कि  दोनों देश टकराव से बच सकते हैं और 2020 के पहले वाला सहयोग बहाल कर सकते हैं।  



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Pulkit Chaturvedi
Senior journalist with over 13 years of experience covering various fields of Journalism.

Keen interests in politics, sports, music and bollywood.

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