सिर्फ ढाई प्रांतों का रह गया है आंदोलन, सिर्फ खाते-पीते और मालदार किसान ही विरोध में जुटे हैं

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किसान नेताओं को आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्होंने काला दिवस मनाते हुए जिस तरह से भी छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन किए हैं, उनमें कोरोना की सख्तियों का पूरा उल्लंघन हुआ है। सैंकड़ों लोगों ने न तो शारीरिक दूरी रखी और न ही मुखपट्टी लगाई।

किसान आंदोलन को चलते-चलते छह महीने पूरे हो गए हैं। ऐसा लगता था कि शाहीन बाग आंदोलन की तरह यह भी कोरोना के रेले में बह जाएगा लेकिन पंजाब, हरयाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों का हौसला है कि अब तक वे अपनी टेक पर टिके हुए हैं। उन्होंने आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर विरोध-दिवस आयोजित किया। अब ऐसा लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ ढाई प्रांतों में सिकुड़ कर रह गया है। पंजाब, हरयाणा और आधा उत्तर प्रदेश। इन प्रदेशों के भी सारे किसानों में भी यह फैल पाया है नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता।

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यह आंदोलन तो चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के प्रदर्शन के मुकाबले भी फीका ही रहा है। उनके आह्वान पर दिल्ली में लाखों किसान इंडिया गेट पर जमा हो गए थे। दूसरे शब्दों में शक पैदा होता है कि यह आंदोलन सिर्फ खाते-पीते या मालदार किसानों तक ही तो सीमित नहीं है ? यह आंदोलन जिन तीन नए कृषि-कानूनों का विरोध कर रहा है, यदि देश के सारे किसान उसके साथ होते तो अभी तक सरकार घुटने टेक चुकी होती लेकिन सरकार ने काफी संयम से काम लिया है। उसने किसान-नेताओं से कई बार खुलकर बात की है। अब भी उसने बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए हैं।

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किसान नेताओं को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्होंने काला दिवस मनाते हुए जिस तरह से भी छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन किए हैं, उनमें कोरोना की सख्तियों का पूरा उल्लंघन हुआ है। सैंकड़ों लोगों ने न तो शारीरिक दूरी रखी और न ही मुखपट्टी लगाई। पिछले कई हफ्तों से वे गांवों और कस्बों के रास्तों पर भी कब्जा किए हुए हैं। इसीलिए आम जनता की सहानुभूति भी उनके साथ घटती जा रही है।

हमारे विरोधी नेताओं को भी इस किसान विरोध दिवस ने बेनकाब कर दिया है। वे कुंभ-मेले और पश्चिम बंगाल के चुनावों के लिए भाजपा को कोस रहे थे, अब वही काम वे भी कर रहे हैं। उन्हें तो किसान नेताओं को पटाना है, उसकी कीमत चाहे जो भी हो। कई प्रदर्शनकारी किसान पहले भयंकर ठंड में अपने प्राण गवां चुके हैं और अब गर्मी में कई लोग बेमौत मरेंगे। किसानों को उकसाने वाले हमारे नेताओं को किसानों की जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। सरकार का पूरा ध्यान कोरोना-युद्ध में लगा हुआ है लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह किसान-नेताओं की बात भी ध्यान से सुने और जल्दी सुने। देश के किसानों ने इस वर्ष अपूर्व उपज पैदा की है, जबकि शेष सारे उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हुए हैं। सरकार और किसान नेताओं के बीच संवाद फिर से शुरू करने का यह सही वक्त अभी ही है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक



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Pulkit Chaturvedi
Senior journalist with over 13 years of experience covering various fields of Journalism.

Keen interests in politics, sports, music and bollywood.

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