दिल्ली को उत्साह व भक्तिभाव से पूर्ण करता रहा है कृष्ण जन्माष्टमी पर्व

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डॉ. रामेश्वर दयाल

विशेष ‘कारणों’ के चलते भारत देश आजकल धर्म व आस्था को लेकर खासा गंभीर है। इसी का परिणाम है कि कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर खूब बातें हो रही हैं और लोग भक्तिभाव भी दिखा रहे हैं। आज हम आपको पुराने दौर में ले चल रहे हैं, जब पुरानी दिल्ली में इस त्योहार को लेकर अलग ही उत्साह हुआ करता था और लोग स्वप्रेरणा से इस पर्व को मनाते थे। उस दौर पर जन्माष्टमी पर झांकियों का ‘निर्माण’ विशेष हुआ करता था।
आज से कुछ साल पहले तक कृष्ण जन्माष्टमी पर पुरानी दिल्ली के कटरों और गलियों के अलावा दिल्ली के अन्य रिहायशी इलाकों में रौनक देखते ही बनती थी। इस पर्व को लेकर आज हम पुरानी दिल्ली को ही फोकस करने जा रहे हैं। तब वहां विशेष कीर्तन का आयोजन होता था और हर कटरे और गली वाले विशेष झांकी सजाते थे, जिन्हें देखने के लिए लोग खूब उमड़ते थे। इन झांकियों को बनाने और उन्हें विशेष रूप देने के लिए लोग खासी माथापच्ची करते थे, ताकि इलाके के लोग उनकी झांकियों की तारीफ करें। इस त्योहार के आने से कई दिन पहले ही कटरों, मुहल्लों और गलियों के निवासी विशेष तैयारी शुरू कर देते थे। इसके लिए चंदा उगाही की जाती थी। सबसे पहले खोज उन बच्चों की होती थी, जिन्हें जन्माष्टमी के दिन कृष्ण और राधा बनाना है। इसके बाद उनके परिजनों से विशेष आग्रह किया जाता था कि जन्माष्टमी के दिन कुछ घंटों के लिए इन बच्चों को ‘दान’ कर दें। फिर इन बच्चों के लिए खरीदारी का दौर चलता। लड़के कटरों की महिलाओं के साथ पुरानी दिल्ली के किनारी बाजार में कूच करते। वहां से कृष्ण-राधा के लिए पहनावे, मुकुट, बांसुरी, हार आदि खरीदे जाते। बाजार से खूब सजावटी सामान भी लिया जाता, साथ ही मूर्तियों को सजाने के लिए चमक-दमक भी ली जाती।
पुरानी दिल्ली का यह किनारी बाजार आज भी ऐसे सामानों के लिए मशहूर है और अब तो दिल्ली-एनसीआर के लोग यहां खरीदारी के लिए जुटते हैं। हां तो, हम बात कर रहे हैं जन्माष्टमी की। तब कटरों और गलियों के कुछ लड़के एक अलग मिशन पर भी जुटे होते। वह था किसी खास स्थान पर झांकी बनाना। इसके लिए कोयले की टाल से ऐसे कोयले खरीदे जाते, जो पहाड़ जैसे नजर आते। कहीं से रेत, ईंटें और बालू लिए जाते। कुछ खिलौने भी खरीदे जाते और जन्माष्टमी के दिन सुबह से ही झांकी बनाने का काम शुरू हो जाता। पहाड़ों के बीच में खिलौना ट्रेन निकालने की झांकी जरूर बनाई जाती, साथ ही पहाडों के ऊपर रुई के फाहे लगाए जाते, ताकि वे बर्फ जैसे लगें। इन झांकियों पर राधा-कृष्ण बने बच्चों को बिठाने के विशेष इंतजाम किए जाते और उस झूले को भी लगाया जाता, जिसमें कृष्ण की मूर्ति को विराजमान करना होता था। पड़ोस के किसी घर से लाइट का इंतजाम कर लिया जाता। जिस लड़के के घर में रिकॉर्ड प्लेयर होता वह भी झांकी के लिए उसे ले आता। शाम ढलते ही लोग इन झांकियों को देखने के लिए आते, चढ़ावा चढ़ाते और बताते कि किस कटरे या गली की झांकी ज्यादा खूबसूरत है। देर रात तक यही कार्यक्रम चलता रहता।
उस दौरान इस अवसर पर कटरों में कीर्तन करने की परंपरा रहती थी। किसी के घर से राधा-कृष्ण की तस्वीरें आ जाती, कोई पुरानी ढोलक उठा लाता और जिसके घर में झांझ-मंजीरे और चिमटे होते, वह भी कीर्तन के लिए पेश कर देता। रात होते ही कीर्तन शुरू होता। इस दौरान दो-एक घंटे के लिए लड़कियों और महिलाओं को कीर्तन चलाने की जिम्मेदारी दी जाती। देसी और फिल्मी भजनों से कीर्तन में आधी रात तक रौनक रहती। कीर्तन के लिए कोई मंडली नहीं आती थी, कटरे के लड़के और लड़कियां ही गाते-बजाते और खूब समां बांधते। आधी रात तक कीर्तन चलता। उसके बाद 12 बजते ही सभी घरों में जन्माष्टमी का व्रत खोलने की चहल-पहल शुरू हो जाती। घरों में दूध-सैंवई और फलों से व्रत खोले जाते और कृष्ण के जन्म होने की बधाई दी जाती।

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