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भगवान शिव के सच्चे प्रतिनिधि ब्रहमस्वरूप एवं युग प्रवर्तक भगवान श्री परशुराम का अवतरण

rashtratimesnewspaper May 7, 2025 1 min read
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महेश चन्द्र मौर्य
युग दृष्टा के रूप में भगवान परशुराम के दिग्दर्शन और निर्दिष्ट दिशा के अनुरूप युग बदलेगा और जरूर बदलेगा, फिर से सतयुग आयेगा व भगवान स्वयं अवतरित हो जगत का कल्याण करेंगे। उनकी प्रेरणा हमें बदलेगी और हम उन्हीं के अनुरूप युग को बदलेंगे।
भारतीय दर्शन निरंतर चलने वाली समय परिवर्तन की घड़ी के चलते इस हजारों वर्षों के समय काल को चार कालों/युगों में विभक्त किया गया, जिन्हें क्रमशः सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग के नाम दिये गये। इन युगों के प्रारम्भ से ही परिवर्तन की प्रकिया सतत् चलायमान रही और हम मानवों को हमेंशा सीख और ज्ञान देती रही
सतयुग ईश्वरीय युग था, जहाँ ईश्वर और ईश्वर तुल्य देवी, देवता, शुद्धि और सत्य के रास्ते पर चलते रहे। “सत्यं वद्, धर्मम चर” के सिद्धान्त पर जगत का कल्याण सुनिश्चित करते गये।

उसी सतयुग में जन्में दमयग्नि पिता और माँ रेणुका के पुत्र भगवान शिव के भक्त, महाशक्तिमान भगवान परशुराम अवतरित हुये। उस युग में उनसे बढ़कर और कोई शक्तशाली महर्षि नहीं हुआ।

उसके बाद त्रेता युग आया जिसमें ईश्वर के ही अवतरण, जग को जीवन देने वाले भगवान राम देश दुनिया के आदर्श बनें और जगत को मानवता का पाठ पढ़ाते हुये मानव को मर्यादित जीवन जीने की सीख दे गये। इसलिए वे “मर्यादा पुरुषोत्तम राम” कहलायें। जिस प्रकार सतयुग में भगवान शिव के भक्त भगवान परशुराम कहलायें, वहीं त्रेता युग में भगवान राम के भक्त महाबली हनुमान अग्रणी भक्त कहलायें। इसके बाद द्वापर युग में संसार को नीति और रीति का मार्ग बताते हुये भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए और उन्होंने मानव को जीवन का सार और आत्मा के स्वरूप के सिद्धांत को बताया। “सत्चिदानन्द स्वरूपाय” होते हुए भगवान श्री कृष्ण ने संसार को गीता का ज्ञान दिया, उससे जगत में ज्ञान और प्रकाश के अद्धभुत संगम का श्रृजन हुआ। उस युग में भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त, पराक्रर्मी, सूरवीर और हर समय शक्ति प्रदर्शन और विध्वंशकारी विचारों से सने-लिपटे पड़े थे, वहीं अनेक कृष्ण भक्तों में कृष्ण भक्ति में सराबोर मीराबाई और नीतिगत विचारों को जानने वाले ‘भीष्म पितामह’ का नाम सदैव उनके साथ जुड़ा रहेगा, भले ही युद्ध के मैदान में सामने से कुछ ओर और अन्दर से कुछ ओर वाली स्थति थी उनकी, इसीलिए उन्होंने सरसैया पर लेटे भगवान श्री कृष्ण को याद कर दम तोड़ा और मुक्ति को प्राप्त हुए।

यद्यपि वर्तमान युग कलयुग है और सभी युगों का समन्वय काल है, जिसमें सतयुग के महादेव भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु, त्रेता युग के भगवान राम, माँ जानकी, महाबलि हनुमान और द्वापर युग के अभीष्ठ लीलाधर भगवान श्री कृष्ण, उनकी महिंमा, लीलाएँ, नीति, रीति और अनीति का नाश करने के लिए उनके द्वारा, महाभारत जैसे युद्ध का आगाज सभी को अपने आप में समाहित किये हुए हैं। युगों के इस अनुपम और आदर्श समय में भगवान परशुराम आज भी समीचीन हैं व महाशक्ति और युग परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे भगवान शिव के प्रिय और धर्म रक्षक, वीर, वृतधारी और महाबली हैं। यह इस बात से सिद्ध होता है कि जब शिव जी का धनुष श्री राम ने तोड़ा तो श्री परशुराम ने यह जानते हुए भी कि भगवान शिव के धनुष को कोई भगवान ही क्षति पहुँचा सकता है और यह किसी साधारण मनुष्य के बसकी बात नहीं। फिर भी उन्होंने निर्भीक होकर श्रीराम और श्री लक्ष्मण को डांटते हुए नसीहत दे डाली “रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न संभार, धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार”।

इसलिए भगवान परशुराम आज भी प्रासंगिक हैं और सनातन के महानायक के रूप में युग परिवर्तन को सुनिश्चित करेगें- “बात से नही तो दण्ड से और दण्ड से नही तो डण्डा से”
 
यह कैसा संयोग हैं कि भारतीय सस्कृति और सभ्यता को सदियों से सींचती, सँवारती और संजोती गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों (त्रिवेणी) के प्रयाग राज स्थित संगम तट पर 144 वर्षों के बाद महाकुम्भ आयोजित हुआ जिसमें 67 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम के पवित्र जल में डुबकी लगायी और अपने जीवन को धन्य किया। इन श्रद्धालुओं में भारत के कौने-कौने से ही नहीं, अपितु विश्व के अनेक देशों से भी लोगों ने आकर स्नान-ध्यान किया। इस अद्धभुत महाकुम्भ में चारों शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरो, साध-सन्तों, महन्तों, अखाड़ो के प्रमुख, नागा, औघड़, अधौरियों ने भी आस्था की डुबकी लगायी।
यूं तो भगवान परशुराम की चर्चा तो अनेकानेक लोग करते है लेकिन मेरी दृष्टि से भगवान परशुराम के सबसे बड़े भक्त पंडित सुनील भराला जी साबित हुए क्योंकि श्री परशुराम के व्यक्तित्व व कृतित्व से मन की गहराईयों से प्रभावित श्री भराला जी ने अपना विशाल हृद्य दिखलाते हुए प्रयागराज में सदी के सबसे बड़े महाकुम्भ में अपने तन-मन और धन को सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया।
युग-युगों से चली आ रही हमारी सनातन परम्परा को धर्मप्रज्ञ, ओजस्वी, झुजारू और राजनेता पण्डित सुनील भराला, जिन्होंने राष्ट्रीय परशुराम परिषद का श्रजन किया और उसका कुशल नेतृत्व कर अपना विशाल हृद्य दिखलाते हुए इस प्रयागराज में 2 लाख वर्ग फुट भूमि पर भगवान परशुराम की 51 फीट उँची आकर्षक एवं सौम्यरूप दर्शाती अद्धितीय प्रतिमा स्थापित करायी और विशाल व भव्य सप्तऋषि पंडाल व शिविर आयोजित किया।

पंडित भराला जी के नेतृत्व में पूरे 45 दिन लगातार महायज्ञ आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 1 करोड़ 8 हजार आहुतियाँ दी गई, सनातन परम्परा के महत्व को कथा वाचकों, धर्माचार्यों, पीठाधीश्वरों ने अपने ज्ञान से लाखों लोगों को लाभान्वित कराया, साथ ही साथ भगवान परशुराम कथा, शिवपुराण, श्रीमद् भागवत् कथा, राम कथा का सुन्दर वाचन किया गया और भगवान परशुराम की आरती के साथ-साथ “परशुराम चालीसा” का प्रकाशन और वितरण भी किया गया। भगवान परशुराम की 1 लाख छोटी और आकृषक मूर्तियों को भक्तों को अपने घर के मन्दिर और गाड़ियों में स्थित करने के लिए वितरित किया गया। सम्मेलन में संगोष्ठियों और अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों का भी आयोजन किया गया और आगंतुका को भगवान परशुराम कें विराट व्यक्तित्व के विषय में बताया गया।

इस प्रकार हमारे यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की “वसुधैव कुटुम्बकम” की परिकल्पना को साकार करने में भगवान परशुराम शीर्ष संवाहक बने क्योंकि उनके चरण हमारी सांस्कृतिक धरोहरो, पर्वत मालाओं, नदी, सागर, सरोवर, भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगो के तीर्थ स्थानों, शक्तिपीठो की पावन भूमि और अनेक चमत्कारिक व धार्मिक महत्व के स्थानों, जिनमें अनेक देशों के भी पवित्र धार्मिक स्थान शामिल है पर पडे।
 
एक शोध के अनुसार जहाँ भगवान श्री परशुराम जी के चरण पड़े वे क्रमशः 21 स्थान इस प्रकार जाने जाते हैं:-
१. कश्मीर, २. दरद, ३. कुन्तिभोज, ४. क्षुद्रक, ५. मालव, ६. शक, ७. चेदि, ८. काशिकरूष, ९. ऋषिक, १०. क्रथ, ११. कैशिक, १२. अङ्ग, १३. बङ्ग, १४. कलिङ्ग, १५. मागध, १६. काशी, १७. कोसल, १८. रात्रायण, १९. वीतिहोत्र, २०. किरात, व २१. मार्तिकावत ।
उपर्युक्त प्राचीन नाम वर्तमान में 56 स्थानों में विभक्त है। भगवान परशुराम ने विभिन्न युद्धों में विजय प्राप्त कर महर्षि कश्यप को दान दिया और महान दानवी कहलायें। इन स्थानों को क्रमशः निम्नलिखित नामों से पहचाना जाता हैः

  1. अङ्ग – वर्तमान बिहार और झारखंड का भाग 2. वङ्ग -वर्तमान बंगाल क्षेत्र (पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश) 3. कलिङ्ग -वर्तमान ओडिशा 4. कालिङ्ग- ओडिशा के समान क्षेत्र 5. केरल – वर्तमान केरल राज्य 6. सिद्धकेरल – केरल से संबंधित क्षेत्र 7. हंसकेरल – केरल का ऐतिहासिक संदर्भ 8. काश्मीर – वर्तमान जम्मू और कश्मीर 9. कामरूप – वर्तमान असम 10. महाराष्ट्र -वर्तमान महाराष्ट्र 11. आन्ध्र- वर्तमान आंध्र प्रदेश 12. सौराष्ट्र -वर्तमान गुजरात का काठियावाड़ क्षेत्र 13. तैलङ्ग – तेलंगाना 14. मलयाल – केरल क्षेत्र 15. कर्णाटक- वर्तमान कर्नाटक 16. अवन्ती – वर्तमान मध्य प्रदेश (उज्जैन क्षेत्र) 17. विदर्भ – महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र 18. मरुदेश – राजस्थान 19. आभीर – महाराष्ट्र और गुजरात का हिस्सा 20. मालव – राजस्थान और मध्य प्रदेश
  2. चोल – तमिलनाडु का चोल साम्राज्य 22. पाञ्चाल – उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड क्षेत्र 23. काम्बोज- अफगानिस्तान और पंजाब का क्षेत्र 24. वैराट – राजस्थान का विराट नगर 25. पाण्ड्य -तमिलनाडु का पांड्य क्षेत्र 26. विदेह- बिहार और नेपाल का तराई क्षेत्र 27. बाह्वीक – पंजाब का हिस्सा 28. किरात – नेपाल और उत्तर-पूर्व भारत 29. बक्तान- अफगानिस्तान 30. खुरासन – ईरान का पूर्वी क्षेत्र 31. ऐराक – ईरान (इराक) 32. भोटान्त – तिब्बत का क्षेत्र 33. चीन – वर्तमान चीन 34. महाचीन- चीन और उससे आगे का क्षेत्र 35. नेपाल – वर्तमान नेपाल 36. शिलहट्ट – वर्तमान सिलहट (बांग्लादेश) 37. गौड- पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश 38. महाकोशल – छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश 39. मगध- बिहार 40. कीकट – बिहार 41. उत्कल- ओडिशा 42. श्रीकुन्तल – कर्नाटक का भाग 43. हूण – मध्य एशिया (हूण साम्राज्य) 44. कोङ्कण -महाराष्ट्र और गोवा का कोंकण क्षेत्र 45. कैकय- पंजाब और पाकिस्तान का क्षेत्र 46. शौरसेन- मथुरा और आसपास का क्षेत्र 47. कुरु – हरियाणा और दिल्ली का क्षेत्र 48. सिंहल – श्रीलंका 49. पुलिन्द – मध्य भारत (आदिवासी क्षेत्र) 50. कच्छ – गुजरात का कच्छ क्षेत्र 51. मत्स्य- राजस्थान का अलवर क्षेत्र 52. मद्र- पंजाब और हिमाचल प्रदेश 53. सौवीर- सिंध और पंजाब 54. लाट – गुजरात 55. बर्बर – अफ्रीका का बर्बर क्षेत्र 56. सैन्धव – सिंध (पाकिस्तान)
  3.  

ये सभी धार्मिक स्थल अध्यात्मिक होते हुए हमारी “अखण्ड और एकीकृत” भारत की कल्पना को साकार करने के साथ-साथ समूचे विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम” के सूत्र में पिरोने का कार्य करेगें।

इस आलेख के माध्यम से मेरा सुझाव है कि इन सभी प्राचीन तौर पर जाने जाने वाले 21 प्राचीन स्थानों जिनको वर्तमान में 56 स्थानों में विभक्त किया गया है, में इन सभी स्थानों पर भगवान परशुराम की स्मृति को अक्षुण्य बनाने के लिए और नई पीढ़ी को उनके शौर्य और पराक्रम को दर्शाने के लिए संग्रहालय विकसित किये जाये क्योंकि वे हमारी महान विरासत के प्रमुख श्रोत्र होगें और साथ ही साथ नोजवानों में देश भक्ति का भाव पैदा करेगें।
मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि युग पुरुष भगवान परशुराम के आदर्श देश, समाज और धर्म को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान कर एकीकृत, समृद्ध और आध्यात्मिक भारत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाऐगें।
ऐसे भगवान परशुराम को समस्त हिन्दू व सनातन प्रेमियों का सत्-सत् नमन।

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