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क्यों डॉक्टर बनते आंत्रप्रेनर

rashtratimesnewspaper June 12, 2025 1 min read

क्यों डॉक्टरों का उद्यमी बनना देश हित में

विवेक शुक्ला

भारत का हेल्थ सेक्टर एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है, जिसमें डॉक्टरआंत्रप्रेनर के रूप में उभर रहे हैं। आमतौर पर अपनी प्रैक्टिस करने या निजी क्लीनिकों खोलने वाले डॉक्टर अब अस्पताल स्थापित करने और बहुत से नए क्षेत्रों में कदम आगे बढ़ा रहे हैं।

कई डॉक्टर अपनी चिकित्सा विशेषज्ञता से आगे बढ़कर विविध उद्यम स्थापित कर रहे हैं। ये सिर्फ देश के महानगरों के ही डॉक्टर ही नहीं कर रहे हैं। इस तरह का बदलाव की बयार को अपेक्षाकृत छोटे शहरों में भी महसूस किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, ऋषिकेश के डॉ. आर.के. गुप्ता को लें। उन्होंने उत्तराखंड में प्रतिष्ठित सीमा डेंटल कॉलेज की स्थापना की। यहीं तक सीमित न रहते हुए, उन्होंने आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी) क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने लगभग दो दशक पहले लक्जरी रिसॉर्ट और होटल व्यवसाय में प्रवेश किया। अब उनके पास ऋषिकेश में पांच रिसॉर्ट/होटल हैं, जो भारत की योग नगरी के रूप में भी जाना जाता है। यह बताना जरूरी है कि डॉ. प्रताप चंद्र रेड्डी, जिन्होंने 1983 में अपोलो हॉस्पिटल्स की स्थापना की, ने भारत का पहला कॉर्पोरेट अस्पताल श्रृंखला बनाकर एक मिसाल कायम की और देश में अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा शुरू की।

इसी तरह, डॉ. देवी प्रसाद शेट्टी ने नारायणा हेल्थ की स्थापना की। उन्हें टूटे दिलों को जोड़ने में महारत हासिल है। यानी वे ह्दय रोग विशेषज्ञ हैं। इन अग्रदूतों ने दिखाया कि डॉक्टर अपनी चिकित्सा विशेषज्ञता को उद्यमी कौशल के साथ जोड़कर स्वास्थ्य सेवा वितरण में व्यवस्थागत कमियों को दूर कर सकते हैं। भारतीय समाज में डॉक्टरों को अक्सर सेवाभावी माना जाता है, लेकिन बदलते समय में उनका कारोबारी या उद्यमी बनना देश के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक अत्यंत सकारात्मक और शुभ संकेत है। इस बदलाव को केवल व्यावसायीकरण के रूप में देखना एक संकीर्ण दृष्टिकोण होगा। वास्तव में, यह भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में एक नई क्रांति का सूत्रपात कर रहा है। जब एक डॉक्टर कारोबारी मानसिकता अपनाता है, तो वह केवल मरीज का इलाज नहीं करता, बल्कि एक विश्व-स्तरीय स्वास्थ्य ढाँचा बनाने के लिए निवेश भी करता है। इस सोच के कारण आज हम छोटे शहरों और कस्बों में भी आधुनिक तकनीक वाले अस्पताल और क्लीनिक देख रहे हैं। एक उद्यमी डॉक्टर बेहतर उपकरण, स्वच्छ वातावरण और कुशल प्रबंधन पर जोर देता है, जिससे सीधे तौर पर मरीजों को उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल मिलती है।

डॉ. आर.के. गुप्ता ने अपने विशेषज्ञता क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करने और डेंटल कॉलेज स्थापित करने के बाद, सोचा कि उन्हें अपने देश और समाज को वापस करना चाहिए और अपने स्तर पर राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बनना चाहिए। अब उनके समूह में 1500 से अधिक कर्मचारी हैं। डॉ. आर.के. गुप्ता, जो अब नीरज ग्रुप ऑफ लक्जरी होटल्स के प्रमुख हैं, कहते हैं कि सीमा डेंटल कॉलेज स्थापित करने के बाद, वह उन क्षेत्रों में भी विस्तार करना चाहते थे जो चिकित्सा क्षेत्र से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े नहीं हैं। इस विचार ने उन्हें अपने शहर में आतिथ्य क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया, जो हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है।

डॉक्टर-उद्यमियों की सफलता उनकी नवाचार करने और निवेश आकर्षित करने की क्षमता से निकटता से जुड़ी है। डॉ. आर.के. गुप्ता के अनुसार, “मैं एक साधारण परिवार से हूं, अपने युवा दिनों में साइकिल से चलता था। बाद में, मैंने मोटरसाइकिल खरीदी, फिर विभिन्न मॉडलों की कारें, और अब मेरे पास सबसे शानदार रोल्स रॉयस फैंटम कार भी है। अब मैंने सब कुछ देख लिया है। अब मुझे चैरिटी करने में सुख महसूस होता है। मैं चैरिटी में बहुत धन देता हूं।” भारत के धन कुबेरों को परोपकार के लिए अपने लाभ का एक हिस्सा लगातार देते रहना चाहिए। उन्हें नए अस्पतालों के निर्माण या पहले से चल रहे अस्पतालों को बेहतर बनाने के लिए धन देने से पीछे नहीं रहना चाहिए। ज्ञान की ‘रोशनी’ दूर तक फैले और उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति को भी मिले, ये सब उद्यमियों का लक्ष्य होना चाहिए। शिव नादर ( एचसीएल), अजीम प्रेमजी ( विप्रो), डॉ आर.के. गुप्ता ( नीरज ग्रुप आफ होटल्स) और दूसरे परोपकारी व्यक्तियों की चर्चा करते हुए ये कहना होगा कि भारत में परोपकार के लिए अपना पैसा देने वाले बहुत कम लोग सामने आते हैं। अगर बात नए दौर के आंत्रप्रेनर की करें तो फिलहाल उनके नाम सामने नहीं आते जो परोपकार के लिए धन दे रहे हैं। सचिन बंसल- बिन्नी बंसल ने फ्लिटकार्ट से अपनी हिस्सेदारी बेचकर हजारों करोड़ रुपए कमाए। क्या उन्होंने उसमें से कुछ पैसा शिक्षा,सेहत या किसी अन्य सेक्टर के लिए दिया? इसी तरह से ओला के फाउंडर भविश अग्रवाल भी परोपकार के नाम पर कभी सुर्खियां नहीं बटोरते। क्या हमारे फिल्मी सितारे या क्रिकेटर नियमित रूप से परोपकार के काम कर रहे हैं? हां, ये कमाते तो सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपए हैं। पर इनके परोपकार को लेकर जानकारी शायद ही किसी के पास हो। ये सांकेतिक समाज सेवा कर देते हैं।

बहरहाल, डॉक्टरों का अस्पतालों से विविध क्षेत्रों में विस्तार करने का रुझान भारत के स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य को नया आकार देने जा रहा है। इसके अलावा, यह प्रवृत्ति स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को बढ़ा रही है। कारोबारी दृष्टिकोण वाले डॉक्टर अपनी सेवाओं का विस्तार करने के लिए नई शाखाएँ खोलते हैं, जिससे उन क्षेत्रों में भी विशेषज्ञ देखभाल पहुँचती है, जहाँ पहले इसका अभाव था। इससे न केवल स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण होता है, बल्कि नर्स, तकनीशियन और सहायक कर्मचारियों के लिए रोजगार के हजारों नए अवसर भी पैदा होते हैं।

प्रतिस्पर्धा हमेशा गुणवत्ता को बढ़ावा देती है। जब कई डॉक्टर-उद्यमी बेहतर सेवाएँ देने की होड़ में होते हैं, तो इसका अंतिम लाभ रोगी को ही मिलता है। इससे न केवल इलाज की गुणवत्ता सुधरती है, बल्कि रोगी अनुभव भी बेहतर होता है।

संक्षेप में, डॉक्टरों का कारोबारी होना सेवा भावना का अंत नहीं, बल्कि उसका विस्तार है। यह एक ऐसा प्रगतिशील कदम है जो बेहतर बुनियादी ढाँचे, व्यापक पहुँच और वैश्विक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से एक स्वस्थ और समृद्ध भारत का निर्माण कर रहा है।

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Vijay Shankar Chaturvedi

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