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रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया: अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी

rashtratimesnewspaper January 22, 2026 1 min read
rupee_against_dollar

उमेश जोशी

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की लगातार गिरावट अब केवल मुद्रा बाजार की एक खबर भर नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की व्यापक आर्थिक सेहत का आईना बन चुकी है। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच रुपये में लगभग 5 से 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 20 जनवरी 2026 को रुपया 90.92–90.93 प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जो न केवल ऐतिहासिक निचले स्तरों के बेहद करीब है, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी एक स्पष्ट चेतावनी है कि वैश्विक और घरेलू दबावों के सामने भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी संवेदनशील बनी हुई है।
बीते वर्ष की शुरुआत में जहां डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित नजर आ रही थी, वहीं वर्ष के उत्तरार्ध में वैश्विक घटनाक्रमों और घरेलू कमजोरियों ने मिलकर मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया। अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती, भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेशकों की सतर्कता ने उभरते बाजारों की मुद्राओं को कमजोर किया। दिसंबर 2025 में रुपया 91.38 तक फिसल गया, जिसे अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर माना जा रहा है। जनवरी 2026 में भी यह दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और मुद्रा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
रुपये की इस गिरावट का सबसे बड़ा असर आम अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। कमजोर रुपये के कारण कच्चा तेल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं का आयात महंगा हो गया है, जिसका सीधा प्रभाव महंगाई पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है। पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है।
व्यापार घाटा भी रुपये की गिरावट का एक अहम पहलू बनकर उभरा है। आयात के महंगे होने और निर्यात से अपेक्षित लाभ न मिल पाने के कारण यह घाटा और गहराता जा रहा है। कमजोर रुपये से निर्यात को सैद्धांतिक रूप से बढ़ावा मिलना चाहिए था, लेकिन वैश्विक मांग में सुस्ती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक अनिश्चितता के चलते यह फायदा सीमित ही रहा है। इसके अलावा डॉलर में लिया गया विदेशी कर्ज अब और महंगा साबित हो रहा है। कंपनियों के साथ-साथ सरकार पर भी कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ा है, जिससे राजकोषीय दबाव स्पष्ट दिखाई देता है।
इस गिरावट के सामाजिक प्रभाव भी कम चिंताजनक नहीं हैं। विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्र, इलाज के लिए विदेश जाने वाले मरीज और आम पर्यटक — सभी के लिए खर्च अचानक बढ़ गया है। डॉलर के महंगे होने का सीधा असर इन वर्गों की जेब पर पड़ रहा है, जिससे रुपये की गिरावट केवल आंकड़ों का खेल न रहकर आम जीवन की वास्तविक समस्या बन जाती है।
यह सच है कि कमजोर रुपये से निर्यातकों, खासकर आईटी और फार्मा जैसे क्षेत्रों को कुछ हद तक लाभ मिलता है, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह लाभ अर्थव्यवस्था को समग्र राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डॉलर बिक्री, तरलता प्रबंधन और अन्य मौद्रिक उपायों के जरिए अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की कोशिश की है, जिससे स्थिति कुछ हद तक संभली है। हालांकि, केवल अस्थायी हस्तक्षेप से स्थायी समाधान संभव नहीं है।
अंततः रुपये की मजबूती घरेलू आर्थिक आधार, निवेशकों के भरोसे, निर्यात क्षमता और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। मौजूदा गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अर्थव्यवस्था को केवल बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए ठोस नीतिगत सुधार, उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने वाली रणनीतियाँ तथा आर्थिक संतुलन को मजबूत करने वाले दीर्घकालिक कदम अनिवार्य होंगे।

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राष्ट्र टाइम्स हिंदी साप्ताहिक समाचारपत्र है, जो 1981 में शुरू किया गया था। यह समाचारपत्र भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित है और हर सप्ताह जारी किया जाता है। इस समाचारपत्र के उद्देश्य के रूप में देश और विदेश की ताजा घटनाओं की विस्तृत विवरण प्रदान करना और आधुनिक समाज में जागरूकता बढ़ाना शामिल है।

राष्ट्र टाइम्स को नई दिल्ली के प्रमुख समाचारपत्रों में से एक माना जाता है जिसका पैमाना देश और दुनिया भर में बड़े वर्गों तक होता है। इस समाचारपत्र का मुख्य आधार हिंदी भाषा है जिससे उन लोगों तक समाचार पहुंचता है जो अंग्रेजी नहीं जानते हैं।

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Vijay Shankar Chaturvedi

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