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शक्ति, संतुलन और लोककल्याण का भारतीय मॉडल थे महाराजा सूरजमल –डा० शिव सिंह रावत

rashtratimesnewspaper February 12, 2026 1 min read
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13 फरवरी, महाराजा सूरजमल की जयंती पर विशेष

अठारहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक विघटन, सत्ता संघर्ष और सामाजिक असुरक्षा के कठिन दौर से गुजर रहा था। मुग़ल साम्राज्य अपनी प्रशासनिक और सैन्य शक्ति खो रहा था, जबकि उत्तर भारत क्षेत्रीय शक्तियों, मराठों, अफ़ग़ानों और स्थानीय शासकों के बीच निरंतर टकराव का क्षेत्र बन चुका था। ऐसे अशांत काल में जिन शासकों ने केवल अवसरवाद और आक्रामक विस्तार का मार्ग चुना, वे इतिहास में अस्थायी सिद्ध हुए। इसी पृष्ठभूमि में महाराजा सूरजमल (1707–1763) का उदय हुआ—एक ऐसे शासक के रूप में जिसने शक्ति को विवेक से, राजनीति को संतुलन से और शासन को लोक कल्याण से जोड़ा।

महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फ़रवरी 1707 को भरतपुर क्षेत्र में जाट शासक राजा बदन सिंह के यहाँ हुआ। उनका पालन-पोषण ग्रामीण और कृषक परिवेश में हुआ, जहाँ जीवन की प्राथमिकताएँ स्पष्ट थीं—कृषि, जल, सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता। यही कारण था कि वे सत्ता को केवल राजसी वैभव के रूप में नहीं, बल्कि समाज के दायित्व के रूप में देखते थे। यह दृष्टि आगे चलकर उनके शासन की मूल पहचान बनी। असलियत यह है कि जब मुग़ल सत्ता कमजोर पड़ रही थी, उस समय अनेक शासक अराजकता को अवसर में बदलने में लगे हुए थे। इसके विपरीत, सूरजमल ने अस्थिरता के बीच संतुलन और संरचना का मार्ग चुना। 1755 में औपचारिक रूप से महाराजा बनने के बाद उन्होंने भरतपुर को एक संगठित, सुरक्षित और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में विकसित किया। उनका उद्देश्य केवल सीमाओं का विस्तार नहीं था, बल्कि जनता, कृषि और संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

सैन्य दृष्टि से महाराजा सूरजमल आक्रामकता के बजाय रणनीतिक रक्षा और दीर्घकालिक सुरक्षा के पक्षधर थे। लोहागढ़ दुर्ग जैसे अभेद्य किलों का निर्माण उनकी दूरदर्शी सैन्य नीति का सशक्त प्रमाण है। 1754 के कुम्हेर युद्ध में मराठा-मुग़ल संयुक्त सेनाओं का सफल प्रतिरोध और 1761 में आगरा किले पर अधिकार—इन घटनाओं ने उन्हें उत्तर भारत की एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया। उल्लेखनीय यह है कि युद्ध को उन्होंने अंतिम विकल्प माना और संवाद, समझौते तथा कूटनीति के मार्ग को सदैव खुला रखा। अन्य शासकों के साथ महाराजा सूरजमल के संबंध व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति पर आधारित थे। मुग़लों के साथ उन्होंने न तो अंध-विरोध अपनाया और न ही अधीनता स्वीकार की। परिस्थितियों के अनुसार सहयोग और दूरी—दोनों का संतुलन उन्होंने बनाए रखा। मराठों से उनका संबंध सहयोग और सीमित टकराव का रहा, जबकि राजपूत राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद अनावश्यक वैमनस्य से वे दूर रहे। वे स्वयं को सत्ता के केंद्र के रूप में स्थापित करने के बजाय, उत्तर भारत में शक्ति-संतुलन के सूत्रधार बने रहे।

सामाजिक स्तर पर महाराजा सूरजमल का शासन समावेशी और व्यावहारिक था। यद्यपि वे जाट समाज के महान प्रतीक माने जाते हैं, परंतु उनका प्रशासन किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं था। योग्यता, निष्ठा और प्रशासनिक क्षमता को उन्होंने सामाजिक पहचान से ऊपर रखा। किसानों, व्यापारियों, कारीगरों और धार्मिक संस्थानों को संरक्षण देकर उन्होंने सामाजिक विश्वास और स्थिरता का वातावरण निर्मित किया। विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारे और सहअस्तित्व की भावना को उन्होंने राज्य की शक्ति का आधार माना।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उनके राज्य की रीढ़ थी। किसान पृष्ठभूमि से आए शासक होने के कारण उन्होंने सिंचाई, जल प्रबंधन और सुरक्षित ग्रामीण परिवेश पर विशेष ध्यान दिया। जलस्रोतों का संरक्षण, कृषि भूमि की सुरक्षा और किसानों को स्थिर वातावरण—इन नीतियों से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ा, बल्कि राज्य की आर्थिक मजबूती भी सुनिश्चित हुई। आज जब देश जल संकट, किसान असंतोष, ग्रामीण पलायन और पर्यावरणीय दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, महाराजा सूरजमल की यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है।

25 दिसंबर 1763 को हिंडन नदी के निकट एक संघर्ष में महाराजा सूरजमल का निधन हुआ। उनका अंत केवल एक शासक का अंत नहीं था, बल्कि उत्तर भारत में संतुलित, विवेकपूर्ण और लोक केंद्रित राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का समापन था। इसके बावजूद उनकी शासन-दृष्टि समय की सीमाओं को लांघकर आज भी मार्गदर्शन करती है।

आज के समाज के लिए महाराजा सूरजमल का संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रासंगिक है। शक्ति यदि जिम्मेदारी से न जुड़ी हो, पहचान यदि समाज को बाँटने का माध्यम बन जाए और शासन यदि लोकहित से कट जाए, तो वह न तो टिकाऊ हो सकता है और न ही न्यायपूर्ण।
आज आवश्यकता है ऐसे नेतृत्व की जो संवाद को संघर्ष से ऊपर रखे, कृषि और जल को नीति के केंद्र में लाए, और विविधताओं को कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति माने। इतिहास को केवल गौरवगाथा के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देने वाले दर्पण के रूप में देखने पर ही महाराजा सूरजमल की वास्तविक प्रासंगिकता समझी जा सकती है।

( लेखक जल एवं पर्यावरण विशेषज्ञ हैं एवं पूर्व हरियाणा सरकार में अधीक्षण अभियंता रहे हैं। वे #वॉक फॉर यमुना अभियान के संयोजक भी हैं।)

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