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नारी से नारायणी: संबोधन नहीं, कर्तव्य

डॉ. नीलम यादव; शिक्षाविद्, बहरोड़ (अलवर) भारतीय सभ्यता प्राचीन काल से ही नारी तत्व के प्रति श्रद्धा और
PULKIT CHATURVEDI March 8, 2026 1 min read
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डॉ. नीलम यादव; शिक्षाविद्, बहरोड़ (अलवर)

भारतीय सभ्यता प्राचीन काल से ही नारी तत्व के प्रति श्रद्धा और चिंतन में अद्वितीय रही है। नारी केवल जीवनदात्री ही नहीं, बल्कि विचारों और संस्कारों की जन्मदाता भी है। उसकी करुणा और चेतना समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। ऋग्वेद से लेकर वर्तमान समय तक हर युग में नारी के त्याग, साहस और समर्पण ने समाज को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। परिवार की आधारशिला होने के साथ-साथ वह राष्ट्रीय निर्माण की भी निर्णायक शक्ति है।

नारी का उत्थान केवल अधिकार का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्र का नैतिक कर्तव्य है। आज 8 मार्च को पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है, जिसका मूल उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है, ताकि वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकें। लैंगिक असमानता को समाप्त कर प्रत्येक क्षेत्र में समान अवसर उपलब्ध कराना ही वास्तविक महिला सशक्तीकरण का आधार है।

सशक्तीकरण का पहला अध्याय बेटी के जन्म से शुरू होता है। परिवार में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव समाप्त कर बेटियों की शिक्षा को मजबूत आधार देना परिवार का पहला कर्तव्य है। उन्हें भविष्य की चुनौतियों और संभावनाओं के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। परिश्रम, संघर्ष, धैर्य और संस्कारों की भावना को विकसित करना शिक्षण संस्थाओं की जिम्मेदारी है। वहीं समाज का दायित्व है कि बेटियों की उपलब्धियों पर उन्हें प्रोत्साहन और संबल प्रदान करे।

विकसित राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की समान भागीदारी और अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है। राष्ट्र केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि व्यक्ति, परिवार, समुदाय और समाज की संयुक्त इकाई है। इसलिए महिला सशक्तीकरण राष्ट्र चिंतन का महत्वपूर्ण विषय है।

आज की नारी पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों के साथ-साथ कार्यस्थल पर भी अपनी जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रही है। शिक्षित और जागरूक महिला न केवल अपने परिवार के विकास में योगदान देती है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। धैर्य, सहनशीलता, करुणा और सामंजस्य जैसे गुणों से युक्त महिलाएँ समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करती हैं।

आज के समय में ‘अल्फा वुमन’ की अवधारणा भी उभर कर सामने आई है। अल्फा वुमन वे सफल और प्रभावशाली महिलाएँ हैं, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी होते हुए अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बनती हैं। वे चुनौतियों को स्वीकार कर आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ती हैं तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाती हैं। स्वावलंबन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी ज्ञान से भी आता है।

वास्तविक महिला सशक्तीकरण तभी संभव होगा, जब पुरुष भी महिलाओं की समान भागीदारी को स्वीकार कर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देंगे। आज देश में महिलाओं की अनगिनत उपलब्धियों के बावजूद अशिक्षा, लैंगिक असमानता, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा और यौन शोषण जैसी समस्याएँ समाज के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

परिवर्तन समय की आवश्यकता है, लेकिन सुधार मानवीय आवश्यकता है। यदि समाज स्वयं में बदलाव लाएगा तो युग भी बदलेगा। स्त्री के त्याग, संघर्ष और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। प्राचीन भारत में स्त्रियाँ केवल श्रद्धा की पात्र ही नहीं थीं, बल्कि विचार और निर्णय की सशक्त वाहक भी थीं।

जनकनंदिनी सीता माता के बारे में ऋषि वाल्मीकि ने लिखा है— “सा धर्मज्ञा महाभागा नित्यमुक्तम् धारिणी।” वहीं स्वामी विवेकानंद ने भारतीय नारी को नि:स्वार्थ भाव से दूसरों के हित के लिए कष्ट सहने वाली अद्वितीय शक्ति बताया है।

स्त्री केवल कर्तव्यनिष्ठ ही नहीं, बल्कि अन्याय के प्रतिकार और धर्म की स्थापना की प्रेरक शक्ति भी है। यही वह दिव्य शक्ति है, जो अज्ञान को ज्ञान में और भय को साहस में बदलकर राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करती है।

निस्संदेह, महिला सशक्तीकरण के साथ ही विकसित राष्ट्र की संकल्पना आने वाले समय में साकार होगी।

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