इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 21 रमजान को हजरत मौला अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में अकीदतमंदों द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस अवसर पर लोग अपने घरों में नज़र पेश करते हैं, महफिलें सजती हैं और इफ्तार व लंगर का आयोजन किया जाता है, जिसमें हर खास और आम शामिल होता है।
इस संबंध में वाहिद यज़दानी ने बताया कि इस दिन अहले-बैत से मोहब्बत रखने वाले अकीदतमंद अपने-अपने घरों में नज़र पेश करते हैं तथा दरगाह शरीफ में महफिल-ए-कव्वाली और जरूरतमंदों व गरीबों की मदद भी की जाती है।उलमा-ए-किराम ने अपने संबोधन में हजरत मौला अली अलैहिस्सलाम के जीवन और शिक्षाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका पूरा जीवन इंसानियत, न्याय और सच्चाई का संदेश देता है। उन्होंने बताया कि मौला अली की शहादत मस्जिद-ए-कूफा में हुई, जो इस्लामी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।उलमा ने मौला अली के संदेश को याद करते हुए कहा कि उन्होंने इंसानियत को खुदा पर भरोसा और नेक रास्ते पर चलने की सीख दी। मौला अली का यह कथन आज भी लोगों को प्रेरित करता है—
“खुदा पर भरोसा उस बच्चे की तरह रखो, जिसे अगर हवा में उछालो तो वह हंसता है, डरता नहीं, क्योंकि उसे यकीन होता है कि उसे प्यार करने वाला कभी गिरने नहीं देगा।”
अकीदतमंदों का मानना है कि अली का जिक्र इबादत है और उनके जिक्र से जिंदगी में हिम्मत, सुकून और सच्चाई की राह मिलती है। इस अवसर पर जगह-जगह सलाम और फातिहा भी पेश किए जाएंगे।
इस मौके पर बाब-ए-साबरिया सहित विभिन्न स्थानों पर अकीदतमंदों द्वारा श्रद्धा और सम्मान के साथ कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।