- बढ़े हुए ECC और बैरियर-फ्री टोल सिस्टम से प्रदूषण कम करने की कोशिश, लेकिन सही तरीके से लागू करने के लिए निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी टेंडरिंग जरूरी
दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में हाल ही में ऐसे निर्देश दिए हैं, जिनसे पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) को और मजबूत बनाया जाएगा। यह फैसला वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है, जिसे कोर्ट ने “उचित, न्यायसंगत और संतुलित” बताया है।
नए नियमों के तहत दिल्ली में प्रवेश करने वाले वाणिज्यिक वाहनों पर ECC दरों में 50% तक बढ़ोतरी की गई है। इसके अलावा हर साल इसमें 5% की अतिरिक्त बढ़ोतरी भी होगी। यह बदलाव 19 अप्रैल 2026 से लागू हो चुका है और इसका उद्देश्य अनावश्यक और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की आवाजाही को कम करना है।
इसी के साथ नगर निगम दिल्ली (MCD) मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग सिस्टम लागू करने की तैयारी कर रहा है। इस नई व्यवस्था में FASTag और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट पहचान (ANPR) तकनीक के जरिए बिना किसी रुकावट के टोल और ECC वसूला जाएगा। इससे ट्रैफिक जाम कम होगा, नियमों का पालन बेहतर होगा और दिल्ली राष्ट्रीय स्तर पर टोलिंग सुधारों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगी।
हालांकि, पिछले अनुभव यह भी बताते हैं कि इस प्रक्रिया में सावधानी बरतना जरूरी है। फरवरी 2024 में MCD द्वारा जारी एक टेंडर में बहुत कड़े और सीमित करने वाले नियम रखे गए थे। इसमें बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए यह शर्त रखी गई थी कि उन्होंने एक ही कॉन्ट्रैक्ट में लगातार दो साल तक 122 टोल लेन संचालित किए हों।
इन सख्त शर्तों के कारण ज्यादातर कंपनियां भाग नहीं ले सकीं और केवल दो ही बोलीदाता सामने आए। कम प्रतिस्पर्धा के कारण सही कीमत तय नहीं हो पाई और आखिरकार टेंडर रद्द करना पड़ा। इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी संतुलित और तार्किक पात्रता शर्तों की जरूरत पर जोर दिया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में बहुत कम प्रोजेक्ट ऐसे हैं जो इतनी कड़ी शर्तों को पूरा करते हैं, जिससे प्रतियोगिता अपने आप सीमित हो जाती है।
ऐसे में, दिल्ली में ECC और MLFF जैसे बड़े बदलावों की सफलता सिर्फ सख्त नियमों और नई तकनीक पर ही निर्भर नहीं करेगी, बल्कि यह भी जरूरी है कि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी हो। ज्यादा से ज्यादा कंपनियों को भाग लेने का मौका देने से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि सरकार को बेहतर राजस्व भी मिलेगा और पर्यावरण से जुड़े लक्ष्य भी आसानी से पूरे हो सकेंगे।