
- उमेश जोशी
हालिया आँकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 में देश का खाद्य तेल आयात एक बार फिर बढ़ा है। ये आँकड़े सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) और वाणिज्य मंत्रालय ने जारी किए हैं। आंकड़ों का अध्ययन करने से पता चलता है कि स्थिति चिंताजनक है।
इस स्थिति पर इसलिए चिंता होती है कि देश खाद्य तेलों की कुल जरूरत का लगभग 56 से 60 प्रतिशत आयात करने को मजबूर है।
वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल खाद्य तेल आयात तीन प्रतिशत बढ़कर 166.51 लाख टन पर पहुँच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 161.82 लाख टन था। यह बढ़ौती भले ही अधिक नहीं है, लेकिन इसका आर्थिक असर कहीं अधिक गंभीर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी और डॉलर के मुकाबले रुपए में लगभग 9.2 प्रतिशत की गिरावट के कारण आयात बिल तेजी से बढ़ा है। तेल वर्ष के शुरुआती छह महीनों (नवंबर से अप्रैल) के दौरान ही आयात बिल 19 प्रतिशत बढ़कर लगभग 87 हजार करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में 73 हजार करोड़ रुपए था।
इस वर्ष खाद्य तेल आयात के रुझान में दो बड़े बदलाव खास तौर पर देखे गए हैं। पहला, नेपाल से ड्यूटी-फ्री आयात में अप्रत्याशित बढ़ोतरी। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते (साफ्टा) के तहत नेपाल को भारतीय बाजार में शून्य शुल्क पर तेल निर्यात की सुविधा प्राप्त है। इसका लाभ उठाते हुए नेपाल से खाद्य तेल आयात 113 प्रतिशत बढ़कर 7.36 लाख टन तक पहुँच गया, जबकि पिछले वर्ष यह केवल 3.45 लाख टन था। नेपाल से मुख्य रूप से रिफाइंड सोयाबीन, सूरजमुखी और आरबीडी पामोलीन तेलों का आयात किया गया। एसईए का मानना है कि यदि नेपाल से यह ड्यूटी-फ्री आयात न बढ़ा होता, तो इस वर्ष कुल आयात में वृद्धि के बजाय गिरावट देखने को मिल सकती थी।
दूसरा बड़ा बदलाव पाम ऑयल की माँग में आई तेजी है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 14 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी के बावजूद पाम ऑयल की खरीद मजबूत बनी रही। तेल वर्ष के पहली छमाही में पाम ऑयल आयात बढ़कर 39.7 लाख टन हो गया, जबकि सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे सॉफ्ट ऑयल्स का आयात घटकर 38.5 लाख टन रह गया। यह संकेत है कि महँगाई के दौर में उपभोक्ता और उद्योग अपेक्षाकृत सस्ते विकल्पों की ओर झुक रहे हैं।
देश का खाद्य तेल आयात का ढाँचा भी वैश्विक राजनीति और बाजार पर निर्भर है। पाम ऑयल मुख्यतः इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। भारत सोयाबीन तेल के लिए अर्जेंटीना, ब्राजील और नेपाल पर निर्भर है, जबकि सूरजमुखी तेल की आपूर्ति रूस और यूक्रेन जैसे देशों से होती है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद सूरजमुखी तेल की वैश्विक आपूर्ति में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया।
घरेलू उत्पादन की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार देश में नौ प्रमुख तिलहनों का उत्पादन करीब 409.98 लाख टन रहने का अनुमान है, जिससे क़रीब 124 लाख टन खाद्य तेल उपलब्ध हो सकेगा। यह देश की कुल जरूरत से काफी कम है।
इसी बढ़ती निर्भरता और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार ‘नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयलसीड्स’ पर तेजी से काम कर रही है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक घरेलू खाद्य तेल उत्पादन 250 लाख टन तक पहुँचाना है। इसके लिए छह लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा दिया गया है।
फिलहाल, स्थिति यही बताती है कि देश की खाद्य सुरक्षा केवल खेतों में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों की चाल पर भी निर्भर हो गई है। ऐसे में आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस और दीर्घकालिक नीति अब केवल आर्थिक नहीं, रणनीतिक आवश्यकता बन गई है।