- उमेश जोशी
घरेलू बाजार में चावल के दाम गिर रहे हैं। इसकी वजह राष्ट्रीय घटक नहीं हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर सीधे घरेलू बाजारों पर दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में भारतीय चावल बाजार में भी ऐसा ही दिलचस्प परिदृश्य देखने को मिला है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है; पश्चिम एशिया सहित अनेक देशों को बड़े पैमाने पर बासमती तथा गैर-बासमती चावल भेजता है। लेकिन, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री परिवहन लागत में अचानक इज़ाफ़ा होने से भारतीय चावल निर्यात की रफ्तार धीमी हो गई है। इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है। चावल के दामों में गिरावट दर्ज की जा रही है।
निर्यातकों के अनुसार पश्चिम एशिया जाने वाले जहाजों का बीमा और मालभाड़ा, दोनों का ख़र्च 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। लाल सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में बढ़ते जोखिम के कारण शिपिंग कंपनियों ने अतिरिक्त प्रीमियम वसूलना शुरू कर दिया है। इससे भारत से होने वाला निर्यात महँगा पड़ रहा है। कई पुराने निर्यात सौदे अब लाभकारी नहीं रह गए हैं और नए सौदों में भी सुस्ती आ गई है; ख़ास तौर से ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों को होने वाले निर्यात पर इसका अ र साफ़ दिखाई दे रहा है।
भारत के चावल व्यापार में पश्चिम एशिया की महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है। बासमती चावल का बड़ा बाजार इन्हीं देशों में है। जब निर्यात की गति धीमी पड़ती है, तो स्वाभाविक रूप से घरेलू बाजार में स्टॉक बढ़ने लगता है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में चावल की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। आम उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि खाद्य महँगाई के दबाव के बीच सस्ता चावल घरेलू बजट को कुछ सहारा देता है।
हालांकि बाजार की तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। कुछ मंडियों में सीमित स्तर पर तेजी भी देखने को मिल रही है। इसकी वजह यह है कि बड़े निर्यातक और कारोबारी भविष्य में निर्यात सामान्य होने की उम्मीद में अभी से खरीद बढ़ा रहे हैं। वे सस्ते दाम पर स्टॉक जमा करने की रणनीति अपना रहे हैं। इस कारण कुछ स्थानीय बाजारों में मांग बढ़ी है और वहाँ कीमतों में हल्की मजबूती बनी हुई है।
लेकिन, इस पूरी स्थिति का सबसे संवेदनशील पक्ष किसानों से जुड़ा है। यदि निर्यात में यह सुस्ती लंबे समय तक बनी रहती है, तो धान किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने में दिक़्क़त हो सकती है। भारत में करोड़ों किसान धान की पैदावार पर निर्भर हैं और निर्यात बाजार उनके लिए अतिरिक्त आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। घरेलू बाजार में कीमतें गिरने का लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है, लेकिन अंततः इसका दबाव किसानों और मिल मालिकों पर पड़ता है।
यह स्थिति एक बार फिर इस कटु सत्य को उजागर करती है कि भारत का कृषि बाजार अब वैश्विक घटनाओं से अलग नहीं रह गया है। समुद्री मार्गों का संकट, युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव अब सीधे भारतीय रसोई तक असर डालते हैं। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह उपभोक्ताओं को राहत देने और किसानों को उचित मूल्य दिलाने के बीच संतुलन बनाए रखे। यदि आने वाले कुछ महीनों में वैश्विक हालात सामान्य होते हैं और मालभाड़ा घटता है, तो चावल निर्यात फिर रफ्तार पकड़ सकता है। लेकिन, फिलहाल निर्यात की सुस्ती से घरेलू बाजार में चावल अपेक्षाकृत सस्ता हो है।