ज्यूडिशियल काउंसिल ने देशभर में सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए भ्रष्ट अधिकारियों को राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाली “सफेद दीमक” बताया है। काउंसिल के चेयरमैन राजीव अग्निहोत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जो संस्थाओं, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को भीतर ही भीतर कमजोर करता है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दीमक मजबूत संरचनाओं को अंदर से नष्ट कर देती है, उसी प्रकार भ्रष्ट अधिकारी शासन, न्याय व्यवस्था और जनकल्याण की नींव को कमजोर करते हैं। उनके कारण नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, योग्य लोगों को अवसर नहीं मिलते और कानून के शासन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
काउंसिल के अनुसार, भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि रिश्वतखोरी, पक्षपात और पद के दुरुपयोग के कारण आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाइयों, देरी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। जनकल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के लिए निर्धारित संसाधनों का भी नुकसान होता है।
श्री अग्निहोत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है। इसके विरुद्ध संघर्ष केवल जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों, सामाजिक संगठनों और संस्थाओं की भी साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने पारदर्शिता, जवाबदेही, व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा तथा भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई और कठोर दंड की आवश्यकता पर जोर दिया।
ज्यूडिशियल काउंसिल ने शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और मीडिया से नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने तथा भ्रष्टाचार के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता फैलाने का आह्वान किया। काउंसिल ने कहा कि वह जन-जागरूकता अभियान, सेमिनार और विधिक साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से सुशासन और पारदर्शिता को बढ़ावा देती रहेगी।
राजीव अग्निहोत्री ने कहा, “भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है। सशक्त और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण के लिए सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक स्तर से भ्रष्टाचार का उन्मूलन आवश्यक है।”