दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग के अंतर्गत दिल्ली संस्कृत अकादमी तथा श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पौरोहित्य विभाग के संयुक्त तत्वावधान में कटवारिया सराय स्थित विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय पौरोहित्य सम्मेलन में संस्कारों, वैदिक परंपराओं और पौरोहित्य कर्म की समकालीन प्रासंगिकता पर गहन विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन में देश-विदेश से आए प्रतिष्ठित विद्वानों, आचार्यों एवं शोधकर्ताओं ने सहभागिता कर अपने विचार प्रस्तुत किए।
सम्मेलन के प्रथम दिवस के द्वितीय सत्र को संबोधित करते हुए मंडी हाउस स्थित गीता भवन के प्रमुख आचार्य नीरज ने भारतीय संस्कृति में संस्कारों के महत्व तथा पौरोहित्य कर्म की सामाजिक एवं आध्यात्मिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “मानव जीवन में संस्कारों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पौरोहित्य कर्म केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा प्रदान करने, सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने तथा नैतिक मूल्यों की स्थापना का एक सशक्त माध्यम है।”
आचार्य नीरज ने कहा कि भारतीय संस्कृति की निरंतरता और सामाजिक समरसता बनाए रखने में संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने वर्तमान समय में युवाओं को भारतीय परंपराओं एवं वैदिक मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत शोधपत्रों और सारगर्भित विचारों ने उपस्थित श्रोताओं को अत्यंत प्रभावित किया। विद्वानों ने पौरोहित्य शिक्षा के आधुनिकीकरण, संस्कारों के वैज्ञानिक पक्ष तथा समाज में उनकी उपयोगिता जैसे विषयों पर भी अपने विचार रखे।
गरिमामय वातावरण में आयोजित यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। कार्यक्रम का समापन विद्वानों के सम्मान और धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।