–राजेश मित्तल
आपने हाल में गौर किया होगा। खाने-पीने की चीजों की निगरानी करने वाली संस्था FSSAI इन दिनों खबरों में है। इसका पूरा नाम है: Food Safety and Standards Authority of India (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण)। इसका काम है कि देश में बिकने वाली खाने-पीने की चीजें सुरक्षित हों। ग्राहक को उनके बारे में सही जानकारी मिले। इस काम में राज्यों के फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की भी अहम भूमिका है।
पनीर का मामला इसका अच्छा उदाहरण है। ग्राहक पनीर खरीदता है तो समझता है कि वह दूध से बना है। लेकिन बाजार में पनीर जैसी ऐसी चीजें भी मिलती रही हैं, जिनमें दूध का इस्तेमाल नहीं होता। वेजिटेबल ऑयल और दूसरी चीजें इस्तेमाल होती हैं। इन्हें आम बोलचाल में एनालॉग पनीर कहते हैं। देखने में पनीर जैसा। खाने में भी वैसा लग सकता है। ग्राहक को बताए बिना असली पनीर की जगह यह देना धोखा है। FSSAI ने हाल के प्रस्ताव में ऐसे उत्पादों के नाम, लेबल और मार्केटिंग में ‘पनीर’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात रखी है।
महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने भी सख्ती दिखाई है। 30 जुलाई, 2026 के आदेश से राज्य में एनालॉग पनीर के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर एक साल की रोक लगा दी। वहां यह सख्ती सिर्फ पनीर तक ही सीमित नहीं रही। एक रेलवे फूड सप्लायर और करीब 20 रेस्तरां के लाइसेंस सस्पेंड किए गए। वजह थी गंदगी, कॉकरोच की समस्या और एक्सपायर्ड सामान का इस्तेमाल। महाराष्ट्र FDA प्रमुख तुकाराम मुंडे का कहना है कि मकसद कारोबार बंद कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि लोगों को सुरक्षित और साफ खाना मिले।
यह सक्रियता स्वागत योग्य है। लेकिन ऐसी सक्रियता देश भर में हो और खाने-पीने की सभी चीजों को लेकर हो। नई फूड टेक्नोलजी ने मिलावट करना और FSSAI के मापदंडों को धोखा देना बहुत आसान कर दिया है। देसी घी को ही लें। हम उसकी खुशबू पर भरोसा करते हैं। लेकिन FSSAI की वेबसाइट बताती है कि वेजिटेबल ऑयल के मिक्स में फ्लेवर मिलाकर उसे घी के रूप में बेचने के मामले सामने आए हैं।
जिस तकनीक का इस्तेमाल धोखा देने के लिए हो रहा है, उसी तकनीक से धोखा पकड़ना होगा। वैज्ञानिक जांच के तरीके मौजूद हैं। जरूरत है कि लैब मजबूत हों। जांच जल्दी हो। मिलावट के नए तरीके आएं तो उन्हें पकड़ने के तरीके भी FSSAI अपडेट करे। ग्राहक सामान को लैब लेकर नहीं जा सकता।
धोखे का एक और रास्ता अधूरी या उलझाने वाली जानकारी है। बिस्कुट का पैकेट उठाइए। सामने स्वाद का वादा मिलेगा। कभी फाइबर, कभी फिटनेस का दावा। लेकिन चीनी कितनी है? नमक कितना है? मात्रा ज्यादा तो नहीं? इसके लिए पैकेट पलटिए। बारीक अक्षर पढ़िए। फिर हिसाब लगाइए। बिस्कुट खरीदने के लिए ग्राहक न्यूट्रिशन का एक्सपर्ट क्यों बने?
अब इस दिशा में भी एक अच्छा प्रस्ताव आया है। ताजा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट में खाने के पैकेट के फ्रंट में न्यूट्रिशन का लेबल लगाने का प्रस्ताव रखा है। सफेद बैकग्राउंड पर लाल रंग का छह कोनों वाला निशान होगा। चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में जिसकी मात्रा तय सीमा से ज्यादा होगी, उसका जिक्र होगा।
दूध, घी, तेल, खोया और मसालों की निगरानी भी सिर्फ त्योहारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरे साल जांच हो। निर्माता से दुकान तक जवाबदेही तय हो। शिकायत करने वाले को जवाब मिले। कार्रवाई होने का भरोसा हो और दोषी को सख्त सजा मिले।
नए-नए अस्पताल खोलने और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के साथ बीमारी रोकने पर भी ध्यान चाहिए। हमारी थाली की सुरक्षा इसकी बुनियाद है। ग्राहक भरोसे से सामान खरीदता है। उस भरोसे की रक्षा होनी चाहिए। पैकेट पर स्वाद के वादे हों तो सेहत का सच भी दिखे। और मिलावट करने वाले नए तरीके खोजें तो निगरानी उनसे दो कदम आगे चले। तभी ‘स्वस्थ भारत’ का सपना साकार हो पाएगा।