उनकी स्वर-साधना भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर : विजय शंकर चतुर्वेदी
भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान साधक, सुरों के उपासक और बनारस घराने की गौरवशाली परंपरा के संवाहक स्वर्गीय पंडित राजन मिश्र जी की 75वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्र टाइम्स के संपादक एवं Accredited Journalists Association (Regd.) के अध्यक्ष विजय शंकर चतुर्वेदी ने उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
विजय शंकर चतुर्वेदी ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में कहा कि पंडित राजन मिश्र जी उन विरल संगीत विभूतियों में से थे, जिनकी कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाली साधना थी। उनके कंठ से निकलने वाली स्वर-लहरियों में भारतीय संस्कृति की आत्मा, अध्यात्म की गहराई और शास्त्रीय संगीत की अनुपम गरिमा का अद्भुत संगम दिखाई देता था।

उन्होंने कहा कि पंडित राजन मिश्र जी और उनके अनुज पंडित साजन मिश्र जी की ऐतिहासिक संगीत जोड़ी ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को देश-विदेश में नई पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई। दोनों भाइयों की जुगलबंदी में सुरों की शु7द्धता, भावों की गहराई और वर्षों की कठोर साधना का ऐसा समन्वय था, जो श्रोताओं को भावविभोर कर देता था।
विजय शंकर चतुर्वेदी ने भावुक शब्दों में कहा, “पंडित राजन मिश्र जी जैसे महान कलाकार कभी वास्तव में हमसे दूर नहीं होते। उनका शरीर भले ही हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी संगीत साधना और उनकी अमूल्य विरासत सदैव हमारे हृदय में जीवित रहेगी। जब भी उनके गाए रागों की स्वर-लहरियाँ सुनाई देती हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो सुरों के माध्यम से भारतीय संस्कृति स्वयं हमसे संवाद कर रही हो।”
उन्होंने कहा कि किसी महान कलाकार का वास्तविक सम्मान केवल उसकी जयंती मनाने में नहीं, बल्कि उसकी कला, उसके आदर्शों और उसकी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने में निहित है। पंडित राजन मिश्र जी का संपूर्ण जीवन संगीत के प्रति समर्पण, अनुशासन और साधना का अनुपम उदाहरण है।
विजय शंकर चतुर्वेदी ने आगे कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। पंडित राजन मिश्र जी ने अपनी असाधारण प्रतिभा से इस परंपरा को समृद्ध किया और विश्वभर में भारतीय संगीत की गरिमा बढ़ाई। उनकी संगीत यात्रा सदैव युवा कलाकारों और संगीत प्रेमियों को प्रेरणा देती रहेगी।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पंडित राजन मिश्र जी की अमर स्वर-साधना आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संगीत की महान परंपरा से जोड़ती रहेगी।
सुर कभी मरते नहीं, साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती और सच्चे कलाकार अपनी कला के माध्यम से युगों-युगों तक जीवित रहते हैं।”* इन्हीं भावों के साथ विजय शंकर चतुर्वेदी ने इस महान संगीत विभूति को कोटि-कोटि नमन करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।