“बंद कमरे से बाहर अपना अर्थ पाता है इतिहास” विषय पर दिल्ली में तीसरा क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान एवं परिसंवाद सम्पन्न
क्रिएटिव हिस्ट्री ट्रस्ट द्वारा समाजवादी शिक्षा संस्थान, रंगश्री, परम्परा/जेएनयू स्कॉलर ग्रुप और बक्सर स्कूल ऑफ हिस्ट्री के सहयोग से आयोजित तीसरा क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान-2026 दिल्ली के सेक्युलर हाउस सभागार में सम्पन्न हुआ। “इतिहास की सरहदें” विषय पर आयोजित इस व्याख्यान और परिसंवाद में इतिहास, साहित्य और समाज विज्ञान से जुड़े विद्वानों ने इतिहास की बहुलतावादी समझ और उसके बदलते स्वरूप पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
1857 की मई क्रांति दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि इतिहास कभी स्थिर नहीं होता और उसकी कोई निश्चित सरहद नहीं होती। जब-जब इतिहास रूढ़ और सीमित हुआ है, तब-तब नई विचारधाराओं, जनआंदोलनों और वैकल्पिक दृष्टियों ने उसे नई ऊर्जा दी है।

मुख्य वक्ता के रूप में पत्रकार-इतिहासकार विवेक शुक्ल ने दिल्ली के स्थापत्य और सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने दिल्ली की किताब दुकानों की परंपरा, कनॉट प्लेस, दरियागंज, पुलों, सड़कों और विभाजन से जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि छोटे-छोटे संदर्भ भी इतिहास निर्माण की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं।
उन्होंने कहा, “बिना इन छोटे-छोटे संदर्भों के किसी भी राष्ट्र या समाज का इतिहास पूरा नहीं होता। इतिहास सिर्फ राजाओं और शासकों का नहीं, बल्कि आम लोगों के अनुभवों और स्मृतियों का भी होता है।”
“इतिहास की सरहदें” विषयक परिसंवाद में इतिहासकार सलिल मिश्र, रश्मि चौधरी, राजनीतिक समाजशास्त्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर और लेखक अख़लाक अहमद आहन ने इतिहास की बहुआयामी प्रकृति पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि इतिहास को केवल सत्ता और शासकों के दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता, बल्कि जनता, जनसंस्कृति और सामाजिक आंदोलनों की भूमिका भी इतिहास की दिशा तय करती है।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास प्रतिदिन बनता है, हालांकि उसकी स्पष्ट रेखाएं समय बीतने के बाद दिखाई देती हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ इतिहासकार एस.एन.आर. रिज़वी ने कहा कि विषय और विचार ही सीमाओं को परिभाषित करते हैं तथा इतिहास को समझने के लिए व्यापक दृष्टि आवश्यक है।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में एस.एन.आर. रिज़वी की पुस्तक “एक इतिहासकार की आत्मकथा”, रश्मि चौधरी और देवेंद्र चौबे की पुस्तक “इतिहास की सरहदें” तथा सोनिका भारती की पुस्तक “डियर इडियट, दिस इज़ लाइफ” का लोकार्पण भी किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत अभिषेक पाण्डेय द्वारा 1857 की क्रांति पर आधारित आदिवासी लोकगीत के पाठ से हुई, जबकि समापन सत्र में धीरेश तिवारी ने 1857 के महानायक कुंवर सिंह पर आधारित नाटक “सुराज” के अंश का प्रभावशाली एकल मंचन प्रस्तुत किया।
व्याख्यान एवं परिसंवाद का संचालन युवा आलोचक अजय कुमार यादव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन युवा अध्येता आशीष कुमार पाण्डेय ने दिया।
कार्यक्रम में साहित्य, इतिहास और समाज विज्ञान से जुड़े बड़ी संख्या में अध्येता एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे, जिनमें अनिल कुमार सिंह, वेद प्रकाश सोनी, अदिति शरण, प्रदीप कुमार, सुदर्शन लाल, सुशील कुमार, अशोक यादव, बृजभूषण चौबे, संजय कुमार, मीरा कुमारी, डॉ. उज़्मा, देवेंद्र चौबे सहित अनेक लोग शामिल थे।