नई दिल्ली।
जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित हमले को लेकर सामने आए स्वतंत्र भारद्वाज के वीडियो ने दिल्ली की कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला सिर्फ एक कथित मारपीट का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संरक्षण के दावे का है जिसने पुलिस की निष्पक्षता और सरकार की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
एक पॉडकास्ट में भारद्वाज ने कथित तौर पर दावा किया कि उसने प्रदर्शनकारी निशु आजाद के पिता संजय कुमार का सिर फोड़ा, लेकिन जेल नहीं गया। उसने दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने संबंधों और समर्थन का भी उल्लेख किया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार उसने कपिल मिश्रा के फोन के बाद खुद को छोड़े जाने का दावा भी किया।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल सरकार और पुलिस से बनता है—अगर एक व्यक्ति खुलेआम यह दावा कर रहा है कि राजनीतिक पहुंच के कारण वह गंभीर हिंसा के मामले में जेल जाने से बच गया, तो इस दावे की तत्काल और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं हुई?
भारद्वाज के दावों को नेताओं का वास्तविक संरक्षण मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा के नाम सार्वजनिक रूप से लिए जाने के बाद सरकार की जिम्मेदारी कहीं बढ़ जाती है। इन दावों पर चुप्पी संदेह को और गहरा करती है।
मामले में दिल्ली पुलिस का कहना है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप निराधार हैं और चोटों को लेकर भी वायरल दावों से अलग तस्वीर सामने आई है। लेकिन यदि पुलिस को अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत साबित करना है, तो उसका सबसे प्रभावी रास्ता पारदर्शी जांच और पूरी कार्रवाई का रिकॉर्ड जनता के सामने रखना है।
रिपोर्टों के मुताबिक FIR पहले दर्ज की जा चुकी थी, लेकिन शुरुआती धाराओं और कार्रवाई को लेकर सवाल उठे। प्रदर्शनकारियों के दबाव के बाद SC/ST Act की धाराएं जोड़ी गईं और मेडिकल जांच के जरिए यह निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि हत्या के प्रयास की धारा लागू होती है या नहीं।
यही घटनाक्रम सरकार की कानून-व्यवस्था पर सबसे असहज सवाल खड़ा करता है: एक नागरिक को न्याय पाने के लिए सड़क पर उतरकर पुलिस पर दबाव क्यों बनाना पड़ा?
लोकतंत्र में कानून का शासन केवल भाषणों से स्थापित नहीं होता। जब किसी हमले के आरोपी के बारे में स्वयं उसके कथित बयान में राजनीतिक पहुंच का दावा सामने आए, तो सरकार को राजनीतिक बचाव की मुद्रा में आने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच इतनी पारदर्शी हो कि किसी को भी सत्ता के संरक्षण का भ्रम न रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा के नाम इस विवाद में जिस तरह सामने आए हैं, उससे अब सरकार के सामने केवल पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का भी सवाल है।
जनता का सवाल सीधा है—क्या दिल्ली में कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है, या राजनीतिक पहुंच का दावा करने वाला व्यक्ति कानून की सख्ती से बच सकता है?
इस सवाल का जवाब किसी प्रेस बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, स्पष्ट कार्रवाई और सार्वजनिक जवाबदेही से ही मिल सकता है।