लोकोत्सव लोक संस्कृति के संस्थान भी हैं :संजय गर्ग

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गढ़वाली, कुमाउँनी एवं जौनसारी अकादमी, दिल्ली द्वारा *उत्तराखण्ड दिव्यांग लोक कला उत्सव* का आयोजन चिन्मय मिशन सभागार, लोधी रोड़, नई दिल्ली में किया गया।


इस अवसर पर गढ़वाली, कुमाउँनी और जौनसारी अकादमी, दिल्ली के सचिव संजय गर्ग ने लोक उत्सवों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोक उत्सव लोक के वे उत्सव होते हैं, जो लोक द्वारा लोकहित के लिए आयोजित किए जाते हैं। लोक उत्सव लोकमन के मनोविज्ञान का जीता-जागता उदाहरण है। राष्ट्रीय एकता का इतिहास लोकोत्सवों के जन्म से ही शुरू हुआ। लोक उत्सव केवल उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि लोक संस्कृति के संस्थान भी हैं। संस्कृति इन सन्दर्भों में उत्तराखण्ड के गढ़वाल, कुमाऊँ और जौनसार की गौरवशाली और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का विशेष महत्व है। श्री गर्ग ने यह भी कहा कि दिव्यांग लोक उत्सव अकादमी का पहला अनूठा प्रयोग और प्रयास है।
इस अवसर पर अनेक गणमान्य व्यक्ति और संस्कृति-प्रेमी दर्शक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
पर्वतीय सांस्कृतिक संस्था की यह उत्तराखण्ड दिव्यांग लोक कला उत्सव की प्रस्तुति राजेन्द्र चौहान के निर्देशन में हुई। कार्यक्रम का प्रारंभ उत्तराखण्ड के लोक जीवन में चर्चित सामूहिक नृत्य *बीजी जावा* की प्रस्तुति सुप्रसिद्ध लोक गायिका कल्पना चौहान के गायन से प्रारम्भ हुई।
नंदा देवी की प्रस्तुति वीरेन्द्र जोशी द्वारा की गई। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोक गायकों द्वारा *हेजी सारयूं माँ, *आज का दिना*, *डांगा रे डांगा*, *आई लच्छू घोर,*जरा ठन्डू चला दे*, सामूहिक नृत्य *बेड़ू पाको बरमासा* गाए गए गीतों से सभागार तालियों से गूंजता रहा। उत्तराखण्डी लोक गायकों में सरोज, धन सिंह, सुनील कुमार, सुनील, पूनम तेगरवाल द्वारा गाए गीतों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर कलाकारों ने पारंपरिक पौशाक में उत्तराखण्डी लोक-नृत्यों की प्रस्तुति की।

कार्यक्रम के अंत में गढ़वाली, कुमाउँनी और जौनसारी अकादमी, दिल्ली के सचिव संजय गर्ग ने सभी अतिथियों, कलाकारों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया।

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