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कृषि अपशिष्ट से स्टील उद्योग की अर्थव्यवस्था बदलने के आसार!

rashtratimesnewspaper March 19, 2026 1 min read
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कोयले के कलुषित साए से बाहर निकलता इस्पात उद्योग

  • उमेश जोशी

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर बढ़ती चिंता के बीच स्टील उद्योग पर भी दबाव बढ़ रहा है कि वह अपनी उत्पादन प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल बनाए। इसी दृष्टि से भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच शुरू हुआ हरित इस्पात (ग्रीन स्टील) का नया प्रयोग महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। ओडिशा में जिंदल स्टील प्लांट में हाल ही में हुए एक परीक्षण में कोयले की जगह धान की भूसी (राइस हस्क) से बने बायोमास पेलेट्स का उपयोग किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि यह तकनीक व्यापक स्तर पर लागू होती है तो भारत के स्टील उद्योग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में क़रीब 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। लेकिन, इस प्रयोग का महत्त्व सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक आयाम भी छिपा है, जो भविष्य में स्टील की लागत, ऊर्जा सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था—तीनों को प्रभावित कर सकता है।

देश में कोयले के भण्डार सीमित हैं इसलिए इस पर निर्भरता घटाने की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर भारत दुनिया के बड़े इस्पात उत्पादकों में शामिल है और इस उद्योग की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा होता है। कोयले की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अक्सर अस्थिर रहती हैं, जिससे उत्पादन लागत भी प्रभावित होती है।

नए प्रयोग में 5 से 10 प्रतिशत तक कोयले को बायोमास पेलेट्स से बदला गया। महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि गैसीफायर प्रक्रिया में ‘सिंगैस’ यानी ‘संश्लेषण गैस’ या ‘सिंथेटिक ‘गैस’ उत्पादन और प्लांट की कार्यक्षमता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। इसका अर्थ है कि कृषि अपशिष्ट भी औद्योगिक ऊर्जा का व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।

यदि भविष्य में इस अनुपात को और बढ़ाया जाता है, यानी कोयले के स्थान पर बायोमास पेलेट्स का अधिक उपयोग किया जाता है तो कोयले की आयात निर्भरता घट सकती है और स्टील उद्योग की लागत का गणित भी बदल सकता है।

कृषि अपशिष्ट के इस नए प्रयोग से नई आर्थिक संभावनाएँ दिख रही हैं।
देश में हर साल बड़ी मात्रा में धान की भूसी, पराली और अन्य कृषि अवशेष पैदा होते हैं। इनका बड़ा हिस्सा या तो बेकार चला जाता है या खेतों में जला दिया जाता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। अगर स्टील उद्योग इन अवशेषों का उपयोग ईंधन के रूप में करने लगे तो यह किसानों के लिए एक अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है। बायोमास की सप्लाई के लिए संग्रह, प्रसंस्करण और परिवहन की एक नई आपूर्ति श्रृंखला तैयार होगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार भी बढ़ सकता है। दूसरे शब्दों में, यह तकनीक कृषि और उद्योग के बीच एक नया आर्थिक सेतु बना सकती है।

हालांकि शुरुआती दौर में इस तरह की हरित तकनीक के साथ एक ‘ग्रीन प्रीमियम’ जुड़ा होता है इसलिए आर्थिक पक्ष को अधिक महत्तव नहीं दिया जाता। बायोमास के संग्रह, पेलेट बनाने और लॉजिस्टिक्स की लागत पारंपरिक कोयले की क़ीमत से अधिक हो सकती है इसलिए शुरुआती चरण में स्टील उत्पादन की लागत में कुछ वृद्धि संभव है। लेकिन, दीर्घकाल में स्थिति अलग हो सकती है। जैसे-जैसे दुनिया में कार्बन टैक्स और उत्सर्जन नियम कड़े होते जा रहे हैं, पारंपरिक कोयला आधारित उत्पादन महंगा पड़ सकता है। ऐसे में कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक उद्योग को भविष्य के दबावों से बचा सकती हैं।

यह परियोजना ऑस्ट्रेलिया की वैज्ञानिक संस्था कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च आर्गेनाईजेशन (सीएसआईआर), भारतीय विज्ञान संस्थान और जिंदल स्टील के सहयोग से चल रही है। यदि यह मॉडल सफल होता है तो भारत वैश्विक बाजार में ग्रीन स्टील उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

आज यूरोप और अन्य विकसित बाजारों में पर्यावरण मानकों के कारण हरित इस्पात की मांग बढ़ रही है। ऐसे में भारत के लिए यह तकनीक केवल पर्यावरणीय समाधान नहीं, बल्कि निर्यात और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा का अवसर भी बन सकती है।

भले ही धान की भूसी जैसे साधारण कृषि अवशेष से यह प्रयोग शुरू हुआ है लेकिन भविष्य में स्टील उद्योग की ऊर्जा व्यवस्था और लागत संरचना—दोनों को बदलने की क्षमता रखता है। यदि नीति और निवेश दोनो का इस प्रयोग को समर्थन मिला, तो यह पहल भारत को कम कार्बन और अधिक टिकाऊ औद्योगिक अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्त्वपूर्ण बढ़त दिला सकती है।

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