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डिजिटल मंडियों का बजा डंका: ‘ई-नाम’ से बदलेगी किसानों की तकदीर!

rashtratimesnewspaper May 1, 2026 1 min read
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  • उमेश जोशी

देश की कृषि अर्थव्यवस्था में डिजिटल बदलाव सिर्फ प्रयोग तक सीमित नहीं है; अब यह वास्तविकता बनता जा रहा है। राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम यानी ई-नाम) के ताज़ा आंकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। बीते वित्त वर्ष तक ई-नाम पर कुल 13.25 करोड़ मीट्रिक टन कृषि उपज का कारोबार हुआ, जिसकी कुल कीमत 4.84 लाख करोड़ रुपए थी। ख़ास बात यह है कि 2024 में जहाँ यह आंकड़ा 3.19 लाख करोड़ रुपए था, वहीं 2026 तक इसमें भारी उछाल देखने को मिला है। यह बढ़ौती सिर्फ़ अंकों में नहीं दिख रही है, बल्कि कृषि विपणन के ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत है।

दरअसल, भारतीय कृषि बाजार लंबे समय तक राज्यवार मंडियों के दायरे में सीमित रहा। कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) व्यवस्था ने स्थानीय स्तर पर व्यापार को संगठित ज़रूर किया, लेकिन इससे किसानों की पहुँच सीमित रही। नतीज़तन, उन्हें अक्सर बेहतर दाम नहीं मिल पाए। ऐसे में 2016 में शुरू किया गया ई-नाम ‘एक राष्ट्र, एक बाजार’ की दिशा में महत्त्वाकांक्षी प्रयास था। 

आज यह प्लेटफॉर्म 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को एक-दूसरे से जोड़ चुका है। इससे जुड़े एक करोड़ 80 लाख से अधिक किसान, दो करोड़ 73 लाख व्यापारी और हजारों किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) इस बात का संकेत हैं कि यह पहल जमीनी स्तर पर लोकप्रियता और स्वीकार्यता हासिल कर चुकी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को अब केवल स्थानीय मंडी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, बल्कि वे देशभर के ख़रीदारों से प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए बेहतर दाम हासिल कर सकते हैं।
ई-नाम की सबसे बड़ी ताकत इसकी पारदर्शिता और दक्षता है। ऑनलाइन बोली, गुणवत्ता जाँच और सीधे बैंक खातों में भुगतान जैसी व्यवस्था न सिर्फ़ बिचौलियों की भूमिका सीमित करती हैं, बल्कि किसानों को समय पर और सुरक्षित भुगतान भी सुनिश्चित करती हैं। डिजिटल भुगतान के बढ़ते उपयोग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वित्तीय समावेशन (इनक्लूज़न) को भी मजबूती मिली है।
‘
हाल के वर्षों में ई-नाम के साथ तकनीकी नवाचारों (इनोवेशंस) का जुड़ना इसकी संभावनाओं को और व्यापक बनाता है। ‘प्लेटफॉर्म ऑफ प्लेटफॉर्म्स’ (पीओपी) के जरिए अब किसान केवल अपनी उपज बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, बीमा, वित्त और यहाँ तक कि मौसम और फसल पूर्वानुमान जैसी सेवाएँ भी एक ही मंच पर उपलब्ध हो रही हैं। यह समेकित दृष्टिकोण कृषि को एक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला के रूप में देखने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम है।

इसी क्रम में इलेक्ट्रॉनिक नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीद (ई-एनडब्लूआर) का ई-नाम के साथ एकीकरण भी उल्लेखनीय है। इससे किसान अपनी उपज को वैज्ञानिक तौर तरीके वाले भंडारण में रखकर बेहतर समय की प्रतीक्षा कर सकते हैं। इस व्यवस्था में किसानों को अपना उत्पाद तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं है। इतना ही नहीं, वे इन रसीदों के आधार पर बैंक से ऋण भी ले सकते हैं। इससे ‘मजबूरी में बिक्री’ की प्रवृत्ति कम होती है और किसानों की सौदेबाजी क्षमता बढ़ती है।

इन सभी सकारात्मक पहलुओं और सुविधाओं के बावजूद चुनौतियाँ कम नहीं हैं। डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट कनेक्टिविटी और कई राज्यों में एपीएमसी सुधारों की धीमी गति जैसी बाधाएँ अभी बरकरार हैं। छोटे और सीमांत किसानों तक इस व्यवस्था का पूरा लाभ पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, गुणवत्ता जाँच की विश्वसनीयता और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को और सुदृढ़ करना भी आवश्यक होगा।

भविष्य की दृष्टि से देखें तो ई-नाम केवल एक डिजिटल मंडी नहीं, बल्कि कृषि सुधारों का केंद्रीय स्तंभ बन सकता है। यदि इसे और अधिक निजी क्षेत्र, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा जाए, तो भारतीय किसान वैश्विक मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बन सकते हैं।

यह निर्विवाद सत्य है कि ई-नाम ने कृषि विपणन में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतिगत समर्थन, तकनीकी विस्तार और जमीनी क्रियान्वयन के जरिए इस पहल को किस हद तक आगे बढ़ाया जाता है। यदि यह गति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय किसान वास्तव में ‘एक राष्ट्र, एक बाजार’ के सपने को जीता हुआ नजर आएगा।

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