जनहित स्वाभिमान संगठन के अध्यक्ष जवाहरलाल धवन का तीखा बयान
नई दिल्ली। जनहित स्वाभिमान संगठन के अध्यक्ष जवाहरलाल धवन ने देश की वर्तमान चुनावी राजनीति और जनता से किए जाने वाले वादों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि आज देश में “मैच फिक्सिंग की तरह चुनाव फिक्स करने” का खेल चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आते ही जनता के सामने ऐसे मुद्दे और वादे परोसे जाते हैं, जिनका वास्तविक जनहित और विकास से बहुत कम संबंध होता है।
धवन ने कहा कि जहाँ चुनाव होते हैं, वहाँ अचानक एसआईआर, ईडी, इनकम टैक्स, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, घुसपैठ, भ्रष्टाचार, हिंदू-मुस्लिम, सनातन, जय श्रीराम जैसे मुद्दे चर्चा में आ जाते हैं। इसके साथ ही महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता, सस्ते गैस सिलेंडर, करोड़ों रोजगार, हर नागरिक के खाते में लाखों रुपये, स्मार्ट सिटी और गरीबों को हवाई यात्रा जैसी घोषणाएँ करके जनता को सपने दिखाए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान आम जनता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी बदहाल जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया जाएगा, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद हालात जस के तस बने रहते हैं। महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रही जनता को “जुमलों” और भावनात्मक मुद्दों में उलझा दिया जाता है।
जवाहरलाल धवन ने कोरोना काल और नोटबंदी का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा असर गरीब और मजदूर वर्ग पर पड़ा। करोड़ों लोगों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि संपन्न वर्ग पर उसका वैसा प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि रोज कमाने-खाने वाले मजदूर, छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग आज भी आर्थिक असुरक्षा और बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों के बाद जनता के मूल मुद्दों — रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई — से ध्यान हटाकर 370, तीन तलाक, लव जिहाद, धार्मिक ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण जैसे विषयों में लोगों को उलझा दिया जाता है। उनके अनुसार यह “राजनीति करने की नई तकनीक” बन चुकी है।
धवन ने कहा कि देश को विश्वगुरु बनाने के नारों के बीच आम आदमी की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे भावनात्मक नारों और चुनावी वादों से ऊपर उठकर देशहित, लोकतंत्र और वास्तविक विकास के मुद्दों पर सोचें।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि आजादी की लड़ाई में भी कुछ लोग अंग्रेजों के साथ खड़े थे और आज भी बड़ी संख्या में लोग केवल राजनीतिक नारों और प्रचार से प्रभावित हो जाते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि देर-सवेर देश में परिवर्तन अवश्य आएगा, बशर्ते जनता जागरूक होकर अपने अधिकारों और वास्तविक मुद्दों के प्रति सजग बने।