केंद्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में आर्य समाज के छठे नियम पर एक ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। कोरोना काल से निरंतर चल रही वेबीनार श्रृंखला का यह 789वाँ आयोजन था, जिसमें आर्य समाज के सिद्धांतों एवं समाज कल्याण के विषय पर विस्तार से चर्चा की गई।
वैदिक प्रवक्ता सुधीर बंसल ने बताया कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने वर्ष 1875 में प्रथम आर्य समाज की स्थापना के समय 28 नियम निर्धारित किए थे, जिन्हें वर्ष 1877 में लाहौर आर्य समाज की स्थापना के अवसर पर संक्षिप्त कर 10 नियमों के रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने आर्य समाज के छठे नियम—“संसार का उपकार करना इस आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करना”—की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण के लिए कार्य करना है।

उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर, आत्मिक विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व समाज सेवा की मजबूत नींव हैं। शुद्ध आहार-विहार, निष्काम कर्म, ईश्वर-प्रणिधान तथा सदाचारपूर्ण जीवन के माध्यम से व्यक्ति स्वयं का और समाज का उत्थान कर सकता है। उन्होंने उपस्थित श्रोताओं से जीवन में सेवा, सहयोग और नैतिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रवीण आर्य ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि ईश्वरीय गुणों और सदाचरण को जीवन में आत्मसात कर ही व्यक्ति सच्चे अर्थों में समाज एवं राष्ट्र की सेवा कर सकता है।
गोष्ठी का संचालन केंद्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशलतापूर्वक किया। कार्यक्रम में कौशल्या अरोड़ा, जनक अरोड़ा, शोभा बत्रा, कमला हंस एवं राम देवी ने अपने मधुर भजनों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
गोष्ठी के अंत में समाज सेवा, नैतिक मूल्यों एवं वैदिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।