नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की आने वाली किताब ‘विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर’ चर्चा में है। बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस कौल किताब के दावों को लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ फिर सुर्खियों में हैं और कांग्रेस ने इस पर सरकार को घेरा है।
जस्टिस कौल का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में जस्टिस कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ कॉलेजियम में नामों पर औपचारिक चर्चा से पहले जजों की नियुक्ति के प्रस्तावित नामों पर सरकार से विचार-विमर्श करते थे। उनके अनुसार, यह तरीका सरकार से पहले ही "मंज़ूरी" लेने जैसा था और उन्हें पसंद नहीं था।
जस्टिस कौल ने बताया कि एक बैठक के दौरान चंद्रचूड़ उन्हें अलग ले गए और पूछा कि क्या प्रस्तावित नियुक्तियों पर सरकार की राय जानने के लिए उसे फोन करना चाहिए। कौल के अनुसार, उन्होंने ऐसा न करने को कहा। उन्होंने यह भी दावा किया कि कॉलेजियम पांच नामों पर सहमत था, पर चंद्रचूड़ एक छठे नाम को भी मंज़ूरी दिलाना चाहते थे।
जस्टिस कौल के मुताबिक, यह चलन चंद्रचूड़ से पहले और बाद में भी रहा है और यही बात उन्हें परेशान करती है। उन्होंने कहा कि वे सरकार से चर्चा के खिलाफ नहीं हैं, पर समस्या यह है कि चर्चा किस चरण में और किस तरीके से होती है। रिपोर्ट के अनुसार, किताब के अंश में भी चंद्रचूड़ को सरकार के प्रति "ज़रूरत से ज़्यादा नरम" बताया गया है। साथ ही कौल ने कहा कि उन्हें चंद्रचूड़ की न्यायिक भूमिका को लेकर चिंता नहीं थी।
चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने अभी किताब पढ़ी नहीं है, इसलिए यह देखे बिना विस्तार से प्रतिक्रिया देना मुश्किल है कि बात किस संदर्भ में लिखी गई है। उन्होंने कहा कि सीजेआई के तौर पर कॉलेजियम बैठकों का उनका अनुभव बेहद अच्छा रहा और कौल के साथ उनका रिश्ता हमेशा सम्मानजनक रहा।
चंद्रचूड़ के अनुसार, उन्हें किसी बैठक से कौल के उठकर जाने या किसी प्रस्ताव में दर्ज असहमति की याद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्तियों में सरकार की भी एक राय होती है और उसका सीजेआई से संवाद होता है, क्योंकि जजों की नियुक्ति के वारंट पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं।
कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि जस्टिस कौल की किताब ने मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सरकार पर न्यायपालिका पर दबाव डालने और उसकी स्वतंत्रता कमज़ोर करने का आरोप लगाया।
रमेश के अनुसार, चंद्रचूड़ ने नियुक्तियों से पहले सरकार से चर्चा की बात से इनकार नहीं किया है, जिससे सवाल और गंभीर हो जाते हैं। उन्होंने पीएमएलए मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कौल के हवाले से कहा गया है कि मामला उनसे चर्चा किए बिना दूसरी बेंच को भेज दिया गया। सरकार की ओर से इन आरोपों पर बीबीसी की रिपोर्ट में कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।
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स्रोत: बीबीसी हिंदी। फोटो: Towfiqu barbhuiya / Pexels