- घुटनों को सुरक्षित रखने के लिए साक्ष्य-आधारित और कम हस्तक्षेप वाले इलाज पर विशेषज्ञों का बढ़ता जोर
नई दिल्ली। ऑर्थोपेडिक चिकित्सा के क्षेत्र में अब इलाज का फोकस केवल जॉइंट रिप्लेसमेंट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि “रीजेनरेशन” यानी प्राकृतिक जोड़ को बचाने और पुनर्जीवित करने की दिशा में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। इसी बदलाव को नई दिशा देते हुए वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नरेश के. अग्रवाल ने नई दिल्ली के होटल नोवोटेल सिटी सेंटर में आयोजित तीसरे दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स 2026 में अपना चर्चित ‘लुधियाना प्रोटोकॉल’ प्रस्तुत किया।
यह प्रतिष्ठित सम्मेलन दिल्ली ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के तत्वावधान में तथा इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें देशभर से आए विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ऑर्थोबायोलॉजिक्स के क्षेत्र में नवीन, व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित उपचार पद्धतियों पर विचार-विमर्श किया।
कोर्स के दूसरे दिन आयोजित घुटनों पर केंद्रित वैज्ञानिक सत्र में डॉ. अग्रवाल ने ऑस्टियोआर्थराइटिस के इलाज के लिए एक समग्र, वैज्ञानिक और कम हस्तक्षेप वाले दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि घुटनों का ऑस्टियोआर्थराइटिस केवल “जोड़ घिसने” की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन और जैविक असंतुलन से जुड़ी स्थिति है।
“जोड़ बदलने से ज्यादा जरूरी है जोड़ बचाना”
डॉ. नरेश के. अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा,
“ऑर्थोपेडिक्स का भविष्य जोड़ को बदलने में नहीं, बल्कि उसे बचाने में है। यदि समय पर सही रीजेनरेटिव इलाज शुरू किया जाए, तो बड़ी संख्या में मरीजों में सर्जरी की आवश्यकता को काफी हद तक टाला जा सकता है।”
‘लुधियाना प्रोटोकॉल’ की खासियत इसकी समग्र रणनीति है, जिसमें प्लेटलेट-रिच प्लाज़्मा (PRP), ग्रोथ फैक्टर्स, ऑर्थोबायोलॉजिक उपचार, तथा शरीर में सूजन कम करने वाले उपायों को एक साथ जोड़ा जाता है। इस पद्धति का उद्देश्य घुटने के प्राकृतिक जोड़ को सुरक्षित रखते हुए उसकी कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखना है।
शोध और क्लिनिकल प्रैक्टिस के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत
इस शैक्षणिक कार्यक्रम का नेतृत्व आयोजन सचिव डॉ. करुण जैन और वैज्ञानिक अध्यक्ष डॉ. आशिम गुप्ता ने किया। दोनों विशेषज्ञों ने चिकित्सा अनुसंधान और मरीजों के वास्तविक इलाज के बीच मजबूत तालमेल बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. करुण जैन ने कहा,
“दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स का उद्देश्य डॉक्टरों को ऐसा व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित ज्ञान देना है, जिसे वे सीधे मरीजों के उपचार में लागू कर सकें।”
वहीं डॉ. आशिम गुप्ता ने कहा,
“ऑर्थोबायोलॉजिक्स तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है। ऐसे में डॉक्टरों के लिए जरूरी है कि वे वैज्ञानिक प्रगति के साथ अपडेट रहें और इलाज में सुरक्षा व मानकीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।”
गैर-सर्जिकल उपचारों की बढ़ती भूमिका
दो दिवसीय इस कोर्स में बोन मैरो एस्पिरेट कंसंट्रेट (BMAC), PRP, स्टेम सेल थेरेपी और अल्ट्रासाउंड-गाइडेड तकनीकों जैसे उन्नत उपचारों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने माना कि आने वाले वर्षों में गैर-सर्जिकल और रीजेनरेटिव इलाज ऑर्थोपेडिक देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगे।
डॉ. अग्रवाल की प्रस्तुति अपने व्यावहारिक अनुभव, स्पष्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मरीज-केंद्रित सोच के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रही। यह प्रस्तुति इस बात का संकेत है कि भारतीय ऑर्थोपेडिक चिकित्सा अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां प्राथमिकता “जोड़ बदलने” से अधिक “जोड़ बचाने” को दी जा रही है।
भारत में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के तेजी से बढ़ते मामलों के बीच, ‘लुधियाना प्रोटोकॉल’ जैसे साक्ष्य-आधारित मॉडल मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रहे हैं, जो न केवल सर्जरी की जरूरत को कम कर सकते हैं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।