- बी.आर. चौहान
आधुनिक जीवनशैली के साथ-साथ अब पर्यावरणीय कारक भी हृदय रोगों के प्रमुख कारण बनकर तेजी से उभर रहे हैं। वायु प्रदूषण, दूषित जल, शोर, रासायनिक संपर्क और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे लोगों के दिल पर गंभीर असर डाल रहे हैं। यह महत्वपूर्ण जानकारी जीएमसीएच जम्मू के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. सुशील शर्मा ने जे एंड के मोहयाल सभा, जम्मू में आयोजित एक दिवसीय हृदय जागरूकता एवं स्वास्थ्य जांच शिविर के दौरान दी।
आम जनता को हृदय रोगों के प्रति जागरूक करने के अपने निरंतर अभियान के तहत आयोजित इस शिविर में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को उन पर्यावरणीय जोखिमों के प्रति सचेत करना था, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन जो आज हृदय रोगों के बढ़ते मामलों के पीछे बड़ी वजह बन चुके हैं।

डॉ. सुशील शर्मा ने कहा कि अब तक हृदय रोगों के लिए उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता जैसे पारंपरिक कारणों पर ही अधिक चर्चा होती रही है, लेकिन हालिया वैश्विक शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय कारक भी हृदय रोगों को तेजी से बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि “हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जो पानी पीते हैं और जिस वातावरण में रहते हैं, वही हमारे हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।”
उन्होंने बताया कि वायु प्रदूषण हृदय स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा बन चुका है। PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप और हृदय विफलता का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कार्यक्रम में जल प्रदूषण को भी गंभीर चिंता का विषय बताया गया। डॉ. शर्मा ने कहा कि सीसा, आर्सेनिक और कैडमियम जैसी भारी धातुओं से दूषित पानी का लंबे समय तक सेवन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और हृदय संबंधी मृत्यु दर को बढ़ाता है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि शोर प्रदूषण भी “साइलेंट किलर” की तरह काम कर रहा है। यातायात और औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न लगातार शोर शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ाता है, जिससे उच्च रक्तचाप और नींद संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। वहीं, रात में अत्यधिक कृत्रिम रोशनी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित कर मेटाबोलिक और हृदय संबंधी बीमारियों को जन्म देती है।
डॉ. सुशील शर्मा ने कहा कि कीटनाशकों, औद्योगिक रसायनों, बायोमास ईंधन के धुएं और जहरीले सॉल्वेंट्स के संपर्क में रहने वाले लोगों में हृदय रोगों का खतरा अधिक देखा जा रहा है, खासकर ग्रामीण और श्रमिक वर्ग में।
उन्होंने जलवायु परिवर्तन को भी हृदय रोगों का बड़ा कारण बताते हुए कहा कि बढ़ती गर्मी, धूल भरी आंधियां, जंगलों की आग, बाढ़ और अचानक मौसम परिवर्तन हृदय रोगियों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। अत्यधिक गर्मी शरीर में पानी की कमी और रक्त के गाढ़ेपन को बढ़ाकर हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
डॉ. शर्मा ने सामाजिक असमानताओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि गरीब और वंचित समुदाय अक्सर प्रदूषित क्षेत्रों में रहने को मजबूर होते हैं और उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं। ऐसे में पर्यावरणीय स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नीति निर्माण का भी विषय है।
उन्होंने कहा,
“हृदय रोग अब केवल जीवनशैली या आनुवंशिकता तक सीमित नहीं रहे। हमारा आसपास का वातावरण भी दिल की बीमारियों का बड़ा कारण बन चुका है। स्वस्थ समाज के लिए स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और सुरक्षित वातावरण उतना ही जरूरी है जितनी आधुनिक चिकित्सा।”
कार्यक्रम के अंत में जे एंड के मोहयाल सभा, जम्मू की प्रबंधन समिति—अनिल दीप मेहता (अध्यक्ष), एम.एम. बक्शी, एन.के. बाली, अरुण चिब्बर, विजय चिब्बर, चंदर बक्शी, सीमा बक्शी, नंददीप बक्शी एवं बलेश्वर बाली—ने डॉ. सुशील शर्मा और उनकी टीम का आभार व्यक्त किया तथा इस जनहितकारी पहल की सराहना की।
इस अवसर पर डॉ. वेंकटेश येल्लापु, डॉ. भोला कुमार, डॉ. आदित्य शर्मा, डॉ. आदर्श शर्मा एवं डॉ. आदिश्वर वर्मा सहित कई चिकित्सकों ने योगदान दिया। शिविर को सफल बनाने में पैरामेडिकल स्टाफ एवं स्वयंसेवकों—राजकुमार, राघव राजपूत, तौसीफ अमीन, मोहम्मद अल्ताफ, मनिंदर सिंह, मुकेश कुमार, गुरप्रीत सिंह, शुभम शर्मा, राजिंदर सिंह और विकास कुमार—की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।