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आ गया नया आधार वर्ष; 2022-23 बना अर्थव्यवस्था का नया आईना

लंबी कवायद के बाद भारत सरकार ने नए आधार वर्ष का एलान कर दिया। यह घोषणा बहुप्रतीक्षित थी।
PULKIT CHATURVEDI March 5, 2026 1 min read
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  • उमेश जोशी

लंबी कवायद के बाद भारत सरकार ने नए आधार वर्ष का एलान कर दिया। यह घोषणा बहुप्रतीक्षित थी। अर्थशास्त्री काफी समय से मंथन कर रहे थे कि नया आधार वर्ष क्या होना चाहिए! मौजूदा आधार वर्ष 2011-12 काफी पुराना हो गया था। सैद्धांतिक और व्यावहारिक तौर पर इस सच को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि आधार वर्ष जितना पुराना होता है, अर्थव्यवस्था की तस्वीर उतनी ही धुंधली नजर आती है। अर्थव्यवस्था की सेहत का सटीक आकलन करने के लिए आधार वर्ष बदलना लाजमी था। चूँकी आधार वर्ष अर्थव्यवस्था की सेहत मापने का सटीक पैमाना होता है इसलिए पुराना आधार वर्ष अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर दिखाने में नाकाम रहता है। आम जीवन का उदाहरण ले लीजिए। मानो कोई व्यक्ति एक स्थान पर खड़ा होकर चारों ओर देखता है। उसे पास की वस्तुएँ दूर की वस्तुओं की अपेक्षा अधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं। ठीक इसी तरह 2011-12 में खड़े होकर वर्तमान अर्थव्यवस्था को या एक-दो साल आगे-पीछे की अर्थव्यवस्था को देखेंगे तो उसकी तस्वीर साफ नहीं दिखेगी; धुंधली दिखेगी। साफ तस्वीर देखने के लिए आधार वर्ष 2022-23 तय किया गया है।
अर्थशास्त्रियों के सामने बड़ा सवाल यह था कि कोरोना काल के बाद के चार वर्षों (2021-22 से 2024-25 तक) में कौन-सा वर्ष आधार वर्ष बनाने के लायक है। बहुत ही महत्त्वपूर्ण सवाल है। आधार वर्ष अर्थव्यवस्था का आईना होता है और यह आइना वर्षों बाद बदल जाता है इसलिए बहुत मंथन के बाद इसका फैसला किया जाता है।
काफी मंथन और सारे घटकों की जांच करने के बाद अर्थशास्त्रियों ने 2022-23 को आधार वर्ष बनाया है। अहम् सवाल यही है कि आख़िरकार 2022-23 को ही क्यों चुना गया!
अर्थव्यवस्था के आंकड़ों की शुद्धता के लिए ‘आधार वर्ष’ का चयन करना बेहद तकनीकी और रणनीतिक प्रक्रिया होती है। कोरोना काल के बाद के चार वर्षों में से 2022-23 के चयन के पीछे ख़ास वजह हैं।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमएसपीआई) आधार वर्ष चुनते समय कुछ विशेष मापदंडों को देखता है। कोविड के बाद का पहला ‘सामान्य’ वर्ष: 2020-21 और 2021-22 पूरी तरह से महामारी और उसके बाद के उतार-चढ़ाव से प्रभावित थे। 2022-23 वह पहला वर्ष था जहाँ आर्थिक गतिविधियाँ (जैसे उपभोग, उत्पादन और निवेश) अपने स्वाभाविक स्तर पर लौट आई थीं।
सर्वेक्षण के आँकड़ों की उपलब्धता भी अनिवार्य है। आधार वर्ष बदलने के लिए उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण की ज़रूरत होती है। सरकार ने 2022-23 में एक बड़ा घरेलू उपभोग सर्वेक्षण पूरा किया है। चूंकि इसके विस्तृत आंकड़े उपलब्ध हैं, इसलिए इसी वर्ष को आधार बनाना वैज्ञानिक रूप से सही है।
‘सापेक्ष स्थिरता’ किसी भी आधार वर्ष का फैसला करने का अहम् आधार होता है। किसी भी वर्ष को आधार वर्ष तब बनाया जाता है जब उसमें कोई बड़ी आर्थिक उथल-पुथल जैसे भारी सूखा, युद्ध या वैश्विक मंदी आदि न हुई हो। वर्ष 2022-23 भारत के लिए तुलनात्मक रूप से स्थिर विकास वाला वर्ष रहा है। वर्ष 2024-25 के आंकड़े अभी पूरी तरह से संकलित नहीं हुए हैं, इसलिए उन्हें अभी आधार नहीं बनाया जा सकता।
आधार वर्ष बदले जाने के साथ एक और अहम् प्रश्न स्वतः पैदा होता है। क्या पिछले आंकड़ों को बदला जाएगा? इस प्रश्न का जवाब ‘हाँ’ है।
जब भी आधार वर्ष बदला जाता है, तो पुराने आंकड़ों को भी नए आधार वर्ष के अनुसार ढाला जाता है। इसे ‘बैक-सीरीज’ डेटा कहा जाता है।
‘बैक सीरीज’ की जरूरत के साथ एक और सवाल जुड़ जाता है। इसका जवाब तीन स्तर पर खोजा गया है।
तुलनात्मक अध्ययन: यदि हम 2026 में खड़े होकर 2022-23 के आधार पर जीडीपी नाप रहे हैं, तो हमें यह जानने के लिए कि 2010 या 2015 या 2020 या किसी भी वर्ष के मुकाबले कितनी प्रगति की है तो हमें उन वर्षों के आंकड़ों को भी उसी चश्मे यानी 2022-23 की कीमतों के आधार पर देखना होगा।
सांख्यिकीय समायोजन: अर्थशास्त्री पुराने डेटा सेट पर नए ‘वेटेज’ लागू करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि 2011-12 में मोबाइल डेटा का अर्थव्यवस्था में योगदान कम था और 2022-23 में ज्यादा है, तो पुराने आंकड़ों में भी इसी नए महत्त्व के अनुसार सुधार किया जाता है।
भ्रम से बचाव: यदि बैक-सीरीज जारी नहीं की जाती, तो पुराने और नए डेटा के बीच एक बड़ा अंतर (बिग जंप) दिखाई देगा, जिससे आर्थिक विकास की दर को समझना मुश्किल हो जाएगा।
नया आधार वर्ष 2022-23 किए जाना से अर्थव्यवस्था की एक “नई और वास्तविक” तस्वीर दिखेगी, क्योंकि इसमें डिजिटल क्रांति, नई कर व्यवस्था (जीएसटी) और बदले हुए उपभोग पैटर्न की झलक मिलेगी।

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