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बेमौसमी बारिश से किसानों की मेहनत का रंग हुआ फीका

rashtratimesnewspaper April 9, 2026 1 min read
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  • उमेश जोशी

अप्रैल की धूप में पककर जब फसल खेतों में सुनहरी चमक बिखेरती है, तो किसान के चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान होती है। यह वही समय होता है जब कई महीनों की कड़ी मेहनत का फल हाथ में आने वाला होता है। लेकिन, इस बार मौसम ने ठीक इसी पड़ाव पर करवट बदल ली।उत्तर भारत खासतौर से राजस्थान हरियाणा और उत्तर प्रदेश में बेमौसमी बारिश और कहीं कहीं ओलावृष्टि ने किसानों की उम्मीदों का रंग फीका कर दिया।

सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों के लिए एक मजबूत भरोसे का आधार होती है, लेकिन फसल भीगने के कारण अब वही एमएसपी गुणवत्ता और नमी के मानकों में उलझ जाएगी। नतीजतन, किसान को फसल का उतना दाम नहीं मिलेगा जिसकी वह उम्मीद लगाए हूए था। अहम् सवाल यह है कि जब फसल ही भीगकर अपनी गुणवत्ता खो दे, तो क्या एमएसपी वास्तव में किसान की मेहनत का पूरा मूल्य दिला पाएगी?

हालांकि यह बारिश हल्की लग सकती है, लेकिन फसल के इस पड़ाव पर इसके दूरगामी परिणाम किसानों के लिए पीड़ादायक हो सकते हैं। अप्रैल का महीना उत्तर भारत में रबी की फसलों खासतौर से गेहूँ की कटाई का चरम समय होता है। बारिश के कारण खेतों में नमी बढ़ गई है, जिससे कटाई का काम रूक गया है। कटी हुई फसल अगर खेत में ही भीग जाए, तो उसके दाने काले पड़ सकते हैं या उनमें फफूंद लगने का डर रहता है। इसके अलावा ओलावृष्टि और तेज हवाओं के कारण कई जगहों पर गेहूँ की खड़ी फसल बिछ गई है। इससे दानों की गुणवत्ता खराब हो जाती है और कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई करना मुश्किल हो जाता है। दानों में नमी बढ़ने से उनकी चमक कम हो सकती है, जिससे बाजार में उचित दाम नहीं मिल पाता।

राजस्थान और हरियाणा के कई इलाकों में सरसों की फसल लगभग तैयार थी या काटी जा चुकी थी। बारिश से खलिहानों में रखी सरसों के भीगने से दानों के झड़ने और तेल की मात्रा कम होने का खतरा है। उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में इस बारिश और हवाओं ने आम के बौर (फूल) और छोटे फलों को नुक़सान पहुँचाया है। टमाटर, मिर्च और बेल वाली सब्जियों में भी नमी के कारण बीमारियां लगने की आशंका बढ़ जाती है।

राजस्थान में जीरा, ईसबगोल और सौंफ जैसी संवेदनशील फसलों को इस बेमौसमी बारिश से काफी नुकसान पहुँचा है।

इस बेमौसमी बारिश का एक सकारात्मक पहलू भी है लेकिन इसका असर बहुत सीमित है।
देर से बोई गई गेहूँ की फसल के लिए यह हल्की बारिश तापमान को कम रखने में मदद कर सकती है, जिससे ‘टर्मिनल हीट’ (समय से पहले गर्मी) का असर कम होगा और दाना पूरी तरह पक सकेगा। लेकिन कुल मिलाकर, वर्तमान स्थिति में यह बारिश फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रही है।

मौसम विभाग ने आने वाले कुछ दिनों के लिए फिर से बारिश और ओलावृष्टि की चेतावनी दी है और साथ ही सलाह भी दी है कि कटी हुई फसल को ऊँचे स्थानों पर तिरपाल से ढककर रखें; खेतों में जल निकासी का उचित प्रबंध करें ताकि पानी जमा न हो।

मार्च-अप्रैल की बारिश को कहर की बारिश भी कह सकते हैं क्योंकि यह बारिश किसानों की मेहनत पर तुषारापात करती है। यह स्थिति किसान के लिए दोहरी मार जैसी है—एक तरफ तो पैदावार कम हो जाती है और दूसरी तरफ जो फसल बचती है, उसकी क्वालिटी खराब हो जाती है जिससे बाजार में सही कीमत नहीं मिल पाती। मौसम का यह मिजाज सीधे तौर पर किसान की साल भर की मेहनत और मुनाफे पर कहर बरपाता है।

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