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बनारसीदास चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि

rashtratimesnewspaper May 3, 2026 1 min read
b_chaturvedi

कलम के उस साधक को नमन, जिसने गिरमिटिया भारतीयों और शहीदों की आवाज़ को अमर कर दिया

  • आशुतोष चतुर्वेदी

“बनारसीदास चतुर्वेदी कौन थे?” तो यह केवल एक नाम का परिचय देने का विषय नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता, साहित्य, स्वतंत्रता आंदोलन और प्रवासी भारतीयों के संघर्ष के एक स्वर्णिम अध्याय को याद करने का अवसर है।
बनारसीदास चतुर्वेदी केवल एक साहित्यकार या पत्रकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय चेतना के ऐसे प्रहरी थे जिन्होंने अपनी लेखनी को समाज, राष्ट्र और मानवता की सेवा का माध्यम बनाया।

यदि उनके व्यक्तित्व को एक पंक्ति में व्यक्त करना हो तो निस्संदेह कहा जाएगा—
“गिरमिटिया भारतीयों की पीड़ा को विश्व पटल तक पहुंचाने वाला और शहीदों की स्मृति को जन-जन तक जीवित रखने वाला दूसरा व्यक्तित्व शायद ही भारत में हुआ हो।”

24 दिसंबर 1892 को उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में जन्मे बनारसीदास चतुर्वेदी ने सादगी, त्याग और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाया। वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, जेल गए, खादी आंदोलन, सविनय अवज्ञा और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयासों में अग्रिम पंक्ति में रहे। उन्हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का सान्निध्य प्राप्त हुआ, जिसने उनके विचारों को और व्यापक बनाया।

गिरमिटिया भारतीयों की पीड़ा को दुनिया तक पहुंचाने वाले योद्धा

बनारसीदास जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ जब उनकी मुलाकात फिजी से लौटे गिरमिटिया मजदूर तोताराम सनाढ्य से हुई।
तोताराम सनाढ्य अपने साथ केवल स्मृतियां नहीं, बल्कि गुलामी, अत्याचार और अमानवीय शोषण की एक पूरी त्रासदी लेकर लौटे थे। बनारसीदास जी ने उनकी आपबीती को गंभीरता से सुना और उसे पुस्तक रूप में दुनिया के सामने रखा—
“फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष”।

यह पुस्तक केवल साहित्यिक कृति नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूर गिरमिट प्रथा के खिलाफ एक ऐतिहासिक दस्तावेज साबित हुई। पुस्तक ने पूरे देश में हलचल मचा दी। इसके विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए और गांधीजी के सहयोगी सी.एफ. एंड्रयूज ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया।
इसके प्रभाव से पूरे देश में गिरमिट प्रथा के खिलाफ जनमत तैयार हुआ और अंततः ब्रिटिश सरकार को 1 जनवरी 1920 को यह अमानवीय व्यवस्था समाप्त करनी पड़ी।

यह उपलब्धि बनारसीदास चतुर्वेदी को भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाती है। वे जीवन भर प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को उठाते रहे और “फिजी की समस्या”, “फिजी में भारतीय”, “सेतुबंध”, “हमारे आराध्य”, “महापुरुषों की खोज” जैसी अनेक महत्वपूर्ण कृतियां लिखीं।

शहीदों की स्मृति को जीवित रखने वाले साहित्यिक सेनानी

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब देश धीरे-धीरे अपने क्रांतिकारियों को भूलने लगा, तब बनारसीदास चतुर्वेदी ने “शहीदों का श्राद्ध” जैसा अनूठा साहित्यिक आंदोलन चलाया।
उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद और जतिंद्रनाथ दास जैसे क्रांतिकारियों की स्मृतियों को संजोया और प्रकाशित कराया।
वे बार-बार देश को यह स्मरण कराते रहे कि आजादी केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि लाखों बलिदानों की कीमत पर प्राप्त हुई है।

हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को नई दिशा देने वाले संपादक

जनवरी 1928 में जब रामानंद चट्टोपाध्याय ने “विशाल भारत” पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, तब उसके संपादन की जिम्मेदारी बनारसीदास चतुर्वेदी को सौंपी गई।
उनके नेतृत्व में विशाल भारत हिंदी जगत की सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पत्रिका बन गई।

उन्होंने हिंदी साहित्य में कई वैचारिक आंदोलनों को जन्म दिया—

घासलेटी साहित्य विरोधी आंदोलन

“कस्मै देवाय” आंदोलन — हम किसके लिए लिखें?

उनकी संपादकीय दृष्टि ने प्रेमचंद, दिनकर, अज्ञेय, हरिवंशराय बच्चन, हजारी प्रसाद द्विवेदी और अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से समृद्ध हिंदी पत्रकारिता

बनारसीदास चतुर्वेदी ने हिंदी साहित्य को वैश्विक विचारधारा से जोड़ा।
एमर्सन, थोरो, मैक्सिम गोर्की, चेखव, पर्ल बक, स्टीफन ज्वाइग और जापानी चिंतक कागावा जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों और विचारकों से हिंदी पाठकों का परिचय कराने में विशाल भारत की बड़ी भूमिका रही।
उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को केवल भाषा का माध्यम नहीं, बल्कि विश्वदृष्टि का मंच बनाया।

जनपदीय चेतना और पत्र लेखन की अद्भुत परंपरा

टीकमगढ़ से प्रकाशित “मधुकर” पत्र के माध्यम से उन्होंने जनपदीय चेतना का अभियान शुरू किया।
स्थानीय समस्याओं, लोकभाषाओं और क्षेत्रीय साहित्य को राष्ट्रीय विमर्श में स्थान दिलाने का उनका प्रयास अभूतपूर्व था।

वे असाधारण पत्र लेखक भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में एक लाख से अधिक पत्र लिखे।
उन्होंने पत्र लेखन को साहित्य की एक स्वतंत्र विधा का रूप दिया।

श्रमजीवी पत्रकारों के अधिकारों के अग्रदूत

बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी पत्रकारों के वेतन और अधिकारों की लड़ाई में भी बनारसीदास चतुर्वेदी अग्रणी रहे।
1945 में अखिल भारतीय हिंदी पत्रकार संघ के पहले अधिवेशन में वे निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए।
उन्होंने पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन की मांग उठाई और श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन को नई दिशा दी।

सादगी और निष्काम सेवा का जीवन

स्वतंत्रता के बाद वे 12 वर्षों तक राज्यसभा सदस्य रहे, लेकिन सत्ता और पद उनके व्यक्तित्व को कभी प्रभावित नहीं कर सके।
उनका जीवन अंत तक अत्यंत साधारण, अनुशासित और सेवा भाव से भरा रहा।
सन् 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

2 मई 1985 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी लेखनी, विचार और संघर्ष आज भी जीवित हैं।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस वैचारिक विरासत को पुनर्जीवित करना है, जिसने पत्रकारिता को मिशन, साहित्य को समाज सेवा और राष्ट्रभक्ति को जीवन का धर्म माना।

बनारसीदास चतुर्वेदी वास्तव में एक ऋषितुल्य व्यक्तित्व थे—
ऐसे साहित्यकार, जिन्होंने कलम को जनसेवा का शस्त्र बनाया और इतिहास में अमर हो गए।

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