
- उमेश जोशी
भारतीय लोकतंत्र के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या में इजाफा हो रहा है तो दूसरी ओर राजनीति में ‘धनबल’ बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता और नैतिकता को दरकिनार कर चुके हैं इसलिए चिंताजनक हालात पैदा हो रहे हैं। परिणामस्वरूप, लोकतंत्र के मौजूदा ढाँचे में आम नागरिक का भरोसा कमजोर हो रहा है। असम विधानसभा चुनाव के 4 मई 2026 को आए नतीजे इस तथ्य की पुष्टी करते हैं।
असम विधानसभा चुनाव के नतीजे केवल सत्ता परिवर्तन या राजनीतिक समीकरणों की कहानी बयाँ नहीं करते, बल्कि इन नतीजों से लोकतंत्र का वो पहलू भी सामने आता हैं जो वाकई चिंताजनक है।
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों की मौजूदगी और आर्थिक विषमता दोनों साथ-साथ बढ़ रहे हैं। एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने चुनावी हलफनामों का विश्लेषण कर जो तथ्य जुटाए हैं उनसे संकेत मिलता है कि गंभीर आपराधिक मामलों का सबसे अधिक बोझ सत्तारूढ़ दल बीजेपी के विधायकों पर है, जो संख्या में भी सबसे अधिक हैं। इसके बाद कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का स्थान आता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और राजनीति के चरित्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
इसी के समानांतर, चुनावी राजनीति में धनबल का प्रभाव और भी स्पष्ट हुआ है। 126 विजयी उम्मीदवारों में से 107 यानी 85 प्रतिशत करोड़पति हैं। 2021 में यह आंकड़ा 67 प्रतिशत था, जो अब तेजी से बढ़ा है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि राजनीति में प्रवेश और सफलता के लिए आर्थिक संसाधन पहले से अधिक निर्णायक होते जा रहे हैं।
पार्टीवार स्थिति देखें तो बीजेपी के 85 में से 74 विधायक (90 प्रतिशत) करोड़पति हैं। कांग्रेस के 19 में से 14 (74 प्रतिशत), बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के 10 में से 8 (80 प्रतिशत) और असम गण परिषद (एजीपी) के 10 में से 6 (60 प्रतिशत) विधायक करोड़पति हैं। राइजोर दल के 2 विधायक (100 प्रतिशत), एआईयूडीएफ के 2 विधायक (100 प्रतिशत) और एआईटीसी का एक विधायक (100 प्रतिशत) करोड़पति हैं। यह रुझान बताता है कि आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग का वर्चस्व लगभग सभी दलों में समान रूप से मौजूद है।
विधायकों की कुल संपत्ति 1112 करोड़ रुपए तक पहुँच चुकी है। विधायक की औसत संपत्ति 2021 के 4.59 करोड़ रुपए थी जो 2026 में बढ़कर 8.82 करोड़ रुपए हो गई है। एआईयूडीएफ के विधायकों की औसत संपत्ति 117.77 करोड़ रुपए है, जो अन्य दलों से कहीं अधिक है; असम गण परिषद के विधायकों की औसत संपत्ति 2.81 करोड़ रुपए है।
दुबारा चुने गए विधायकों के आंकड़े इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करते हैं। 63 विधायक दुबारा चुने गए हैं; उनकी औसत संपत्ति 2021 में 4.25 करोड़ रुपए थी, जो 2026 में बढ़कर 8.02 करोड़ रुपए हो गई यानी 88 प्रतिशत की बढ़ौती हुई है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह वृद्धि सामान्य आर्थिक प्रगति का परिणाम है या सत्ता के साथ जुड़े लाभों का।
शिक्षा और आयु के संदर्भ में तस्वीर अपेक्षाकृत संतुलित है। एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि 71 प्रतिशत विधायक स्नातक या उससे ऊपर शिक्षित हैं, जबकि 29 प्रतिशत 10वीं से 12वीं तक शिक्षित हैं। उम्र से संबंधित आंकड़ों से यह उजागर हुआ है कि युवा विधायक (25 से 40 वर्ष) सिर्फ 9 प्रतिशत हैं। 41 से 60 वर्ष के आयु वर्ग के विधायक 71 प्रतिशत हैं, इससे राजनीति में युवा भागीदारी की सीमित उपस्थिति स्पष्ट होती है।
महिला प्रतिनिधित्व अब भी बेहद कम है। कुल 126 विधायकों में सिर्फ 7 महिलाएँ (6 प्रतिशत) हैं, जो 2021 के 5 प्रतिशत से मामूली सुधार है। यह सुधार संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।