मुंबई। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) वैकल्पिक निवेश फंड यानी AIF के ढांचे का विस्तार करने के लिए जल्द ही एक सर्कुलर जारी कर सकता है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार सेबी के पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान ने मुंबई में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट्स समिट में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संशोधित ढांचे में उच्च वृद्धि क्षमता वाली परिसंपत्तियों को मान्यता देने के प्रावधान भी शामिल होंगे।
क्या बोले संदीप प्रधान
प्रधान ने कहा कि संशोधित ढांचा अभी विकसित हो रहा है और इस पर बोर्ड की बैठक हो चुकी है। उनके अनुसार नियामक बहुत जल्द एक सर्कुलर लाएगा, जिसमें प्रतिभूति बाजार में उच्च वृद्धि या उतार-चढ़ाव वाली परिसंपत्तियों का पहलू भी जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि इस समावेश से AIF उद्योग में मान्यता प्राप्त निवेशकों का पूल मौजूदा 1 लाख से बढ़कर 4 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है।
AIF क्या होते हैं
रिपोर्ट के अनुसार AIF निजी तौर पर पूंजी जुटाने वाले निवेश माध्यम हैं, जो संस्थागत निवेशकों और उच्च संपत्ति वाले व्यक्तियों से धन लेकर असूचीबद्ध प्रतिभूतियों जैसी गैर-पारंपरिक परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं। जटिल और कम तरलता वाली परिसंपत्तियों में निवेश के कारण इनमें जोखिम अधिक होता है। इसी वजह से इन पर खुदरा निवेश उत्पादों से अलग नियामकीय ढांचा लागू होता है।
अगस्त के परामर्श पत्र के प्रस्ताव
रिपोर्ट के मुताबिक सेबी के अगस्त 2026 के परामर्श पत्र में मान्यता प्राप्त निवेशकों की पात्रता शर्तों को आसान बनाने का प्रस्ताव है। प्रस्ताव 6 के तहत प्रतिभूतियों में कम से कम 5 करोड़ रुपये निवेश रखने वाले व्यक्ति और कम से कम 20 करोड़ रुपये निवेश रखने वाली कंपनियां पात्र हो सकती हैं। इसके प्रमाण के रूप में इलेक्ट्रॉनिक समेकित खाता विवरण (eCAS) या ब्रोकर स्टेटमेंट स्वीकार किए जाने का प्रस्ताव है।
अन्य प्रस्तावों में निवेश प्रबंधकों को ग्राहकों को सीधे जोड़ने की अनुमति देना शामिल है। साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और भारत से बाहर रहने वाले पोर्टफोलियो निवेशकों जैसे कुछ अनिवासी निवेशकों को स्वतः मान्यता प्राप्त निवेशक मानने का प्रस्ताव भी है।
पूर्व अध्यक्ष यूके सिन्हा की चेतावनी
इसी कार्यक्रम में सेबी के पूर्व अध्यक्ष यूके सिन्हा ने पिछले एक दशक में भारत के वैकल्पिक निवेश उद्योग में आए बदलाव का उल्लेख किया। उन्होंने फंड-ऑफ-फंड्स ढांचे के जरिए पूंजी उपलब्ध कराने और सार्वजनिक-निजी जोखिम पूंजी का सहयोगी माहौल बनाने में सरकार की भूमिका को रेखांकित किया।
हालांकि सिन्हा ने आगाह किया कि निवेश से व्यापक सामाजिक और आर्थिक लाभ मिलना चाहिए। उनके अनुसार यदि यह धारणा बनी कि रिटर्न को जनकल्याण से ऊपर रखा जा रहा है, तो उद्योग को नियामकीय और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने अस्पतालों में निजी इक्विटी निवेश को लेकर उठ रहे सवालों का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या ऐसे निवेश से बिस्तर, सुविधाएं और इलाज के नतीजे बेहतर हो रहे हैं या केवल मरीजों की देखभाल की कीमत पर रिटर्न बढ़ाया जा रहा है।
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स्रोत: The Hindu। फोटो: Pixabay / Pexels