- राजेश मित्तल
अहोई अष्टमी। अहोई का मतलब है ‘अनहोनी को होनी बनाना’। इसकी कथा बताती है कि मां की ममता में इतनी शक्ति है कि वह यमराज से भी अपने बच्चे को वापस ला सकती है। अहोई अष्टमी दरअसल बच्चों का त्योहार है। इस दिन मां अपने बच्चों की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए व्रत रखती है। पुराने समय में यह व्रत सिर्फ बेटों के लिए रखा जाता था। आज बहुत से परिवारों में बेटे और बेटियों, दोनों के लिए रखा जाता है। अहोई माता को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उनकी पूजा से संतान को लंबी उम्र और अच्छी सेहत मिलती है। कुछ दंपति संतान पाने की कामना से भी यह व्रत रखते हैं।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आने वाला यह दिन पूरे उत्तर भारत में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन सुबह दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनता है, शाम को तारों के दर्शन होते हैं और मां जल अर्पित करती हुई अपने बच्चों के लिए शुभकामना करती है। कुछ माताएं निर्जला (बिना जल-अन्न) व्रत रखती हैं, तो कुछ पानी पीकर व्रत रखती हैं। दोनों ही तरीके मान्य हैं।
अहोई अष्टमी की कथा
अहोई की कई लोककथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, किसी गांव में एक महिला अपने सात बेटों के साथ रहती थी। दिवाली से पहले वह घर की लिपाई के लिए मिट्टी लेने गई। मिट्टी खोदते समय उसके औजार से अनजाने में सेई के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। सेई कांटों वाला छोटा जीव होता है, जिसे कथा में स्याहू भी कहा जाता है। महिला को बहुत दुख हुआ। कुछ समय बाद उसके सातों बेटे लापता हो गए। गांव के लोगों ने उन्हें मृत मान लिया। दुखी महिला ने एक बुजुर्ग को अपनी व्यथा सुनाई। बुजुर्ग ने उसे अहोई माता की पूजा और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगने की सलाह दी।
उसने अष्टमी को व्रत रखा। माता और सेई का चित्र बनाकर पूजा की। लोककथा के अनुसार, अहोई माता प्रसन्न हुईं और उसके बेटे सकुशल लौट आए। तभी से इस व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। कहानी का संदेश भी समझने लायक है। अपने बच्चों से प्रेम के साथ दूसरे जीवों के बच्चों के प्रति दया रखना भी जरूरी है।
व्रत कैसे रखा जाता है?
सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। हाथ में जल लेकर संकल्प लें – ‘मेरे बच्चों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए मैं अहोई माता का व्रत रखती हूं।’ पूरा दिन सत्संग, कथा सुनने या बच्चों के बारे में सकारात्मक सोचने में बिताएं। शाम को तारों के दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है। चंद्रमा बहुत देर से उगता है, इसलिए ज्यादातर लोग तारों को देखकर ही पारण करते हैं।
पूजा की सामग्री
- अहोई माता का चित्र या दीवार पर गेरू से बना चित्र
- रोली, अक्षत (कच्चा चावल), फूल, धूप, दीपक
- जल से भरा करवा या कलश
- हलवा-पूरी या मिठाई का भोग
- चांदी की छोटी अहोई (स्याहू) और मोती (यदि परंपरा हो)
- मौली, घी और कपास की बत्ती
पूजा कैसे करें?
- शाम को साफ जगह पर अहोई माता का चित्र लगाएं या दीवार पर बनाएं।
- दीपक जलाएं। रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें।
- भोग लगाएं।
- कथा पढ़ें या सुनें।
- तारों के दर्शन होने पर करवे के जल से तारों को अर्घ्य दें और व्रत खोलें।
इस व्रत में कोई जटिल विधि नहीं होती। सिर्फ सच्ची ममता और श्रद्धा चाहिए। दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में भी कई माताएं ऑफिस से जल्दी लौटकर या घर बैठकर इस व्रत को पूरे मन से निभाती हैं।
अहोई अष्टमी हमें याद दिलाती है कि मां की दुआ सबसे बड़ी ताकत है। आज जब आप दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं और तारों को देखकर जल अर्पित करें, तो सिर्फ बच्चों की उम्र के लिए ही नहीं, बल्कि उनके अच्छे संस्कार और खुशहाल भविष्य की भी प्रार्थना करें।
अहोई माता सबकी रक्षा करें।