2014-15 में बीजेपी ने राष्ट्रीय दलों में सबसे अधिक आय घोषित की थी। पार्टी की कुल आय लगभग ₹970 करोड़ रही, जिसमें 89% हिस्सा स्वैच्छिक चंदे से आया। उसी वर्ष करीब ₹913 करोड़ खर्च किए गए, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रचार और विज्ञापन पर था। 2013-14 में पार्टी की कुल आय ₹673 करोड़ और घोषित संपत्ति ₹780 करोड़ के आसपास थी। उस समय बैंक बैलेंस लगभग ₹295 करोड़ बताया गया था, जो 2024 तक बढ़कर ₹10,000 करोड़ से अधिक हो चुका है।
मार्च 2026 में जारी ADR रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में बीजेपी की कुल आय ₹6,769 करोड़ रही, जो पिछले वर्ष से लगभग 56% अधिक है। देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय का करीब 85% हिस्सा अकेले बीजेपी के पास है। ₹20,000 से अधिक के चंदे में पार्टी को लगभग ₹6,074 करोड़ मिले, जिनमें 91% हिस्सा कॉर्पोरेट घरानों और इलेक्टोरल ट्रस्टों से आया। अकेले प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने करीब ₹2,180 करोड़ दिए। कुल घोषित संपत्ति अब ₹10,000 करोड़ के पार पहुँच चुकी है।
RTI और ADR रिपोर्टों के अनुसार बीजेपी को मिलने वाले चंदे का लगभग 92-94% हिस्सा कॉर्पोरेट जगत से आता है। टाटा, रिलायंस, बिड़ला जैसे बड़े उद्योग समूह सीधे दान देने के बजाय इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से फंड देते हैं। “Unknown Sources” यानी अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि कई बार बड़ी रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में दिखाकर असली स्रोत छिपाए जाते हैं। 2013 में CIC ने राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में माना था, लेकिन किसी भी दल ने इसे स्वीकार नहीं किया।
2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद फंडिंग का बड़ा हिस्सा फिर इलेक्टोरल ट्रस्ट और बैंक ट्रांसफर के जरिए आने लगा। विशेषज्ञ “Quid Pro Quo” यानी बदले में लाभ की राजनीति की ओर इशारा करते हैं। कंपनियों को सरकार से लाइसेंस, टेंडर, जमीन और नीतिगत मंजूरी चाहिए होती है, इसलिए राजनीतिक चंदा “Cost of Doing Business” बन चुका है। कुछ शेल कंपनियों द्वारा भारी चंदे देने पर भी सवाल उठते हैं।
आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत राजनीतिक दलों को टैक्स में पूरी छूट मिलती है। 2024-25 में बीजेपी ने लगभग ₹3,774 करोड़ खर्च किए, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रचार और ब्रांडिंग पर गया। मीडिया विज्ञापनों पर लगभग ₹1,464 करोड़, सोशल मीडिया और आईटी सेल पर ₹500 करोड़ से अधिक, हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड प्लेन पर ₹168 करोड़ तथा रैलियों और मंच निर्माण पर ₹134 करोड़ खर्च हुए। उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए ₹853 करोड़ दिए गए।
विश्लेषकों का कहना है कि लगातार प्रचार और डिजिटल नैरेटिव मैनेजमेंट से “Bandwagon Effect” पैदा किया जाता है, जिससे जनता के बीच जीत की धारणा बनाई जाती है। डेटा एनालिटिक्स और माइक्रो-टारगेटिंग के जरिए मतदाताओं तक उनकी पसंद के अनुसार राजनीतिक संदेश पहुँचाए जाते हैं।
2024-25 में ₹20,000 से अधिक का चंदा देने वाले केवल 5,522 व्यक्ति या संस्थाएँ थीं, जबकि आम नागरिकों का योगदान कुल फंड का सिर्फ 5-6% रहा। आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र धीरे-धीरे एक “Political Corporate Industry” में बदल रहा है, जहाँ चुनावी राजनीति पर कॉर्पोरेट फंडिंग और ब्रांडिंग का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।