देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर वायु प्रदूषण के बढ़ते संकट से जूझ रही है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दिल्ली का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 124 दर्ज किया गया है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित सुरक्षित स्तर से कई गुना अधिक है। WHO के मानकों के अनुसार PM2.5 का सुरक्षित स्तर लगभग 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर माना जाता है, जो AQI 25 के आसपास के स्तर के बराबर है।
विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली का Population Weighted AQI 131 रहा, अर्थात राजधानी की बड़ी आबादी अपेक्षाकृत अधिक प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है। शहर में सबसे खराब स्थिति NSIT द्वारका क्षेत्र की दर्ज की गई, जहां AQI 180 तक पहुंच गया। यद्यपि यह “मध्यम” श्रेणी में आता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह स्तर बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और श्वसन रोगों से पीड़ित लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में PM10 और PM2.5 प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निर्माण गतिविधियां, सड़कों से उड़ने वाली धूल, वाहनों का उत्सर्जन, डीजल जनरेटर और अन्य स्थानीय प्रदूषण कारक हैं। मानसून के आगमन के बावजूद प्रदूषण का यह स्तर चिंता बढ़ाने वाला है और यह संकेत देता है कि प्रदूषण नियंत्रण उपाय अभी भी पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं।
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय माकन ने सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों, विशेष रूप से निर्माण स्थलों और सड़क की धूल, पर सख्त नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने अधिक प्रभावित क्षेत्रों, विशेषकर NSIT द्वारका, में विशेष निगरानी और स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।
अजय माकन ने मांग की कि दिल्ली के सभी वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशनों का रियल-टाइम AQI डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए ताकि नागरिकों को सही जानकारी मिल सके और संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही भी तय हो सके। उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण केवल सरकारी घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर पर उसके परिणाम दिखाई देने चाहिए।
उन्होंने कहा, “स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। दिल्लीवासियों को स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से प्रभावी और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए तो सर्दियों के मौसम में स्थिति और भयावह हो सकती है। ऐसे में प्रशासन, उद्योग, नागरिक समाज और आम जनता को मिलकर प्रदूषण के खिलाफ व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता है।
दिल्ली की वर्तमान वायु गुणवत्ता एक स्पष्ट चेतावनी है कि प्रदूषण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट बन चुका है। ऐसे में यह सवाल और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्या राजधानी के नागरिकों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का उनका मौलिक अधिकार मिल पाएगा।
“साँस लेना मौलिक अधिकार है, सुविधा नहीं।”
दिल्ली की हवा आज यही संदेश दे रही है।